एमसीडी चुनाव के ज़रिये लोकतंत्र को पढ़ने की नायाब कोशिश........

                                           पंकज कुमार झा, मनीष कुमार, देवारती राय चौधरी

अब तक हमने लोकसभा चुनाव, विधान सभा चुनाव यहाँ तक की पंचायत के चुनावों को अपने एथ्नोग्राफिक कैनवाश में कैद किया था। यह पहली दफा था जब युवा रिसर्चरों, सहायक प्राध्यापकों व पत्रकारों की टोली ने IESAI की छतरी तले एमसीडी चुनाव को भी अध्ययन करने का मन बनाया। लगभग डेढ़ दर्जन विद्याथियों को फौज़ के साथ हम भी निकल पड़े नगर निगम चुनाव की ज़मीन व आ-बो-हवा को सूंघने। गौरतलब है कि हमारे साथ-साथ IESAI टीम के करीब सैकड़ो युवा-युवतियों की टीम भी पूरे दिल्ली में इस चुनाव का गहन अध्ययन व शोध कर रहे थे।

कोई जीते-कोई हारे...हमें इससे क्या?

आज जबकि अधिकांश मीडिया एजेंसी व शोध संस्थाएँ इस बात को साबित करने अपनी पीठ थपथपा रही है कि हमारा आकलन सौ फीसदी सही हुआ। हमने जो कहा था उतनी सीटें आईं। लेकिन हम आपको बताने चाहते हैं कि हमारा यह लक्ष्य व उद्देश कभी नहीं रहा। इस लिहाज़ से हम जरुर इस प्रतियोगी युग में भी आउटडेटेट हैं। लेकिन हम लोकतंत्र की इस सफ़र को जीना चाहते हैं, नागरिक की सहभागिता व उसके गहरी जीजिविषा को नज़दीक से जाँचना परखना चाहते हैं। भारतीय लोकतंत्र के इस खूबसूरत पर्व यानि चुनाव में इतनी विविधता व खूबसूरती है कि इसे केवल चुनावी परिणाम बताकर रोकना इसकी महत्ता को सीमित करना होगा। हम इस दृष्टिकोण से भविष्य की राजनीति व रणनीति का हिस्सा बनना चाहते हैं। आज के बाजार प्रायोजित मीडिया के इस युग में जब युवाओं की एक छोटी टोली इस काम को अंज़ाम देने के लिए आगे बढ़ती है तो इसे बेहद संदेह व संशय के नज़रिये से देखा जाता है, शायद देखा भी जाना चाहिए। परंतु यही चुनौती हमारे ताकत साबित होगी। शायद यही कारण है कि हमने चुनाव के दौरान जनसभाओं, प्रचार, रैलियाँ, जलसे, का विस्तार से एथ्नोग्राफिक अध्ययन करने की कोशिश की है। इसके साथ-साथ मतदान वाले दिन भी हमने विस्तार से पोलिंग बूथ का अध्ययन किया व मतदाताओं से वोट की अहमियत, उन्हें वोट क्यों देना चाहिए उन सवालों पर विस्तार से बातचीत किया।

स्वरुप नगर वार्ड नंबर 19 क्यों है खास.......

नगरनिगम के उत्तरी इलाके स्थित स्वरुप नगर का वार्ड नंबर 19 एक महिला आरक्षित सीट है। जब हम स्वरुप नगर के इलाके में पहुँचे तो हमारी मुलाकात पूर्व प्रधान 60 वर्षीय अमरनाथ चौधरी से हुई। उनके हवाले से हमें यह जानकारी मिली कि स्वरुप नगर का यह इलाका 1977 से अस्तित्व में आया। उनका परिवार भी 1987 में यहाँ आकर बसा। स्वरुप नगर वार्ड नंबर 19 के अंतर्गत प्रमुख रुप से भगत सिंह पार्क, राणा पार्क, जीवन पार्क, चंदन पार्क, राजीव नगर, व सिरसपुर गाँव है जबकि नाले के ठीक उस पार स्वरुपनगर स्थित है।

विकास के सारे पैमाने पर फिसड्डी है स्वरुपनगर....

अगर स्वरुप नगर के इलाके में आप घूमेंगे तो राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के विकास व गवर्नेंस संबंधी सारे दावे पानी मांगते हुए नज़र आयेंगे। इस इलाके में परिवहन से जुड़ी सभी सड़के ज़र्जर हैं, आस पास कोई बाजार नहीं है, ना तो बैंक है ना ही कोई पोस्ट ऑफिस, स्वास्थ्य सुविधा के लिए कोई अस्पताल। स्थानीय पार्षद पिछले पाँच साल में 4 बार भी इलाके में नहीं आईं। स्थानीय निवासी कलुआ पाल के अनुसार यहाँ ना तो कोई जच्चा बच्चा केन्द्र हैं, ना कोई स्कूल, इस इलाके में ट्रांसपोर्ट की गाड़ी दिन भर चलती रहती है जिससे सड़क का कबाड़ा निकला हुआ है। अपराध की घटनाएँ दिन प्रतिदिन बढ़ रही है। पुलिस स्टेशन भी 5-6 किलोमीटर दूर है। ऐसे में लोकल फेस व मुद्दा इस चुनाव में बेहद अहम होगा।

 

पूर्वांचल के वोटरों की सबसे अधिक है तादाद यहाँ

करीब 60 हजार कुल वोटरों में से स्वरुप नगर के इलाके में 80 फीसदी पूर्वांचल के वोटरों की तादाद है। जबकि अन्य बीस फीसदी में हरियाणा, उत्तराखंड, उड़ीसा, पंजाब से आये लोकबाग भी यहाँ रहते हैं। इस लिहाज़ से यहाँ जीत-हार की चाभी पूर्वाचल के वोटरों के हाथ में ही केन्द्रित है। इस मुद्दे पर बोलते हुए इलाके के सुशील कुमार चौधरी के अनुसार, हालांकि इस इलाके में बाहरी बनाम बिहारी की लड़ाई शुरु से होती रही है। इस इलाके के स्थानीय लोगों को बिहारी समाज का बढ़ना एक दम नहीं सोहाता। फिर भी पॉलिटिक्स में हमारी तूती बोलती है। इसलिए अब सभी हमारे पीछे-पीछे घूमते हैं।

राजनीति वही करता है जो या तो बहुत अमीर है या फिर फ़कीर......

 

अपने शोध के सफ़र में लोकतंत्र व मौजूदा राजनीति के सवाल पर बोलते हुए चौसठ फुटा निवासी रंधीर चौधरी ने कहा कि राजनीति तो वही करता है जी जिसकी जेब गर्म हो...जो चलते फिरते नोट की गड्डी लुटाता चले, या फिर जेब से कंगाल आदमी ही मतंग होकर, एक नये जोश व सपने देखकर राजनीति में पैर आज़माता है। जब हमने यहाँ खड़े उम्मीदवारों की लंबी लिस्ट देखी तो यह बात सच साबित होने लगी। सूची में जहाँ एक तरफ 70-70 गोदाम व सैकड़ों एकड़ ज़मीन के मालिक उम्मीदवार के रुप में थे तो दूसरी तरफ निर्दलीय के रुप में ऐसे अनेक उम्मीदवार भी खड़े थे जिनके जीवन की गाड़ी  किसी तरह चल रही थी। इससे साफ लगने लगा था, लोकतंत्र में ही सपने सबके साकार होते हैं। उन सपनों की स्वरुप नगर का यह इलाका जीवंतता प्रदान कर रहा था।

 

दारु मुर्गा पक्का वोट.....

पंचायत व एमसीडी के चुनाव में टकटकी लगाये दारुबाजों की बाछे खिल जाती है। चुनाव में दारु व पैसा तो मानो पर्याय ही बनता जा रहा है। लाख निर्वाचन आयोग के प्रयासों के बावजूद एमसीडी चुनाव में दारु की तो बाढ़ ही लगी रहती है। इस दौरान अपनी नाम उजागर ना करने की शर्त पर इलाके के एक प्रतिष्ठित व्यक्ति ने बताया कि प्रत्येक दिन उम्मीदवार के द्वारा उन्हें 50 हजार रुपया स्थानीय लोगों को दारु मुर्गा बांटने के लिए दिया जा रहा है। लोग बहुत चाव से दारु मुर्गा की ताक में रहते हैं। स्थानीय लोकबाग कहते हैं कि बिना दारु मुर्गा खर्च किये किसी को वोट नहीं मिलेगा। स्वरुपनगर निवासियों के बीच से यह जुमला चाय-समोसा कच्चा वोट दारु मुर्गा पक्का वोट आज बड़ी तेज़ी से उछाला जा रहा है।

दारु बनाम कैंपा कोला, फ्रूट्स....

स्वरुप नगर वार्ड नंबर 19 में बड़ी पार्टियों से जुड़े कार्यकर्ताओं ने बताया कि अमूमन सभी दल पुरुषों को दारु व मुर्गा बांटकर यही सोचती है कि उसके वोट पक्के हो गये। परंतु इस बार चुनाव के दौरान इलाके की महिलाओं ने भी अपनी तरफ से कुछ मांगे हमारे सामने रखीं। उनका कहना था कि सभी दल के लोग केवल पुरुष वोटरों पर ही ध्यान देते हैं जबकि महिलाओं की कोई नहीं सुनता। हमारे लिए भी कैंपा कोला व फल-फूल उपलब्ध कराये जाए। गौरतलब है कि सभी पार्टियों ने इस बात को ध्यान देते हुए महिलाओं के लिए भी सुविधा उपलब्ध कराया।

किरायेदारों का एक महीने का किराया माफ....

राजनीति दल के नेताओं ने स्थानीय वोटरों को विशेष रुप से किराये पर रह रहे वोटरों को आकर्षित करने के लिए उनके एक महीने का किराया माफ इस शर्त पर किया है कि वह उन्हें वोट देंगे। इसके लिए दो तरीका अपनाया जा रहा है। या तो बड़े रसूखदार उम्मीदवार जिनके अपने माकान में 100-200 वोटर रहते हैं। उनके 1 महीने का किराया उनके पक्ष में वोट करने के ऐवज़ में माफ कर दिया गया है। या फिर उम्मीदवार द्वारा माकान मालिक को उसके किरायेदार की 1 महीने का किराया पूर्व में दे दिया गया है।

बल्ली व शेरसिंह की भी बढ़ गई है तूती.........

स्वरुपनगर के इलाके में एमसीडी चुनाव आते ही बल्ली व शेरसिंह जैसे मास्टर माईंडों की भी तूती बोलने लगती है। स्थानीय लोगबाग बताते हैं कि उनके पास ऐसी तरकीब है कि वह अंतिम समय तब लगभग 5-10 हजार वोटरों को एक पक्ष से दूसरे पक्ष में कर सकते हैं। ये वोट डालने से वाले दिन से 1-2 दिन पहले से ही रात में सक्रिय रहते हैं। प्रत्येक घर में पार्टी के द्वारा बांटे जाने वाले मतदाता स्लीप के साथ-साथ वे 500-1000 का नोट भी बांटते हैं। ऐसे में वोट देने जाते जाते वक्त तक वोटर उनके संपर्क में रहता है। कई बार उन वोटरों को अपने घर से पोलिंग बूथ तक वाहन से पहुँचाने का भी काम वह करते हैं। दिलचस्प है कि एमसीडी चुनाव में ऐसे मास्टर मांईंडों को अपने पक्ष में जोड़ने के लिए विभिन्न दल लाखों रुपया खर्च करते हैं।

वोट डालना हमारा कर्म है...........

हमारी टीम ने मतदान के दिन पोलिंग बूथ का भी अध्ययन किया। हमने स्वरुपनगर के निवासियों से विशेष रुप से यह सवाल किया कि वह वोट क्यों डालना चाहते/चाहती हैं। इस पर 70 वर्षीय ओमवती ने बताया कि वोट नही डालूँगी तो सरकार हमारा नाम काट देगी। वोट हमारा कर्म है, जब तक हाथ-पैर चलता रहेगा हम अपना कर्म करती रहूँगी, और वोट भी डालती रहूँगी। इसके बाद हमें बार-बार यह लगने लगा था कि चुनाव कोई भी जीते लोकतंत्र के प्रति समाज के सबसे अंतिम आदमी-औरत की आस बची रहे यह सबसे जरुरी है।

 

 

  पंकज कुमार झा, दिल्ली विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान विभाग से पीएचडी हैं। IESAI टीम से जुड़े हुए हैं।

 

  मनीष कुमार, स्वामी श्रद्धानंद कॉलेज में राजनीति विज्ञान विभाग में सहायक प्रोफेसर हैं और IESAI की कोर टीम से जुड़े हुए हैं।

 

  देवारती रॉय चौधरी, किरोड़ीमल कॉलेज में राजनीति विज्ञान विभाग में सहायक प्रोफेसर हैं, और IESAI की कोर टीम से जुड़ी हुई हैं।

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