स्वतंत्र भारत के लोककल्याणकारी राज्य के विकास संबंधी सपनों, ग्रामीण राजनीति व संस्थाएँ में पसरी गुटबंदी, भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद पर व्यंग्य करती श्रीलाल शुक्ल की कालजयी रचना रागदरबारी पर राजनीति विज्ञान विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय में जबरदस्त रोचक चर्चा होने वाली है। यह दो दिवसीय चर्चा का आयोजन दिनांक 29 व 30 जनवरी, कॉन्फेंस हॉल में होने जा रहा है।

राग दरबारी पर चर्चा हिन्दी साहित्यकारों की टोली में तो होती रही है। परंतु यह पहला अवसर है जब रागदरबारी पर जबरदस्त चर्चा राजनीति विज्ञान विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय के निर्देशन में हो रहा है। विकास की राजनीति को समझने में जिसकी रुचि हो, गाँव पर शोध करने वाले शोधार्थी, ज़मीनी राजनीति पर खास रुचि रखने वाले विद्यार्थी, पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता, उन सबके लिए यह विशेष अवसर है की वह इसमें शिरकत करें। और विशेष वक्ताओं के साथ-साथ पूरा चर्चा में आप भी भागीदार हों। ऐसा मौका कम मिलता है जब स्थानीय राजनीति, नौकरशाही, विकासवादी अध्ययन व लोकनीति के जमीनी पक्ष पर बात रागदरबारी को सामने रखकर किया गया हो।

वक्ताओं के नाम देखकर आप खुद को रोक नहीं पायेंगे..............

दो दिन चलने वाले इस कॉन्फैंस में प्रो. फिलिप ओडनबर्ग (कोलंबिया यूनिवर्सिटी), शैलजा फिनेल (कैंब्रिज यूनिवर्सिटी), प्रोफेसर विनोद पार्थसारथी (जामिया मिलिया इस्लामिया), पम्पा मुखर्जी (पंजाब यूनिवर्सिटी), प्रोफेसर सुधा पाई (जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय), प्रोफेसर यामिना अय्यर (सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च), प्रोफेसर सरोज गिरी (दिल्ली विश्वविद्यालय), प्रोफेसर सौरभ गुप्ता व डॉ. राजीव वर्मा ( Univeritat Hohenheim), सुश्री पैनोरमा रे (स्कूल शिक्षिका), श्री मानस्वी कुमार (आईएएस व डॉक्टोरल शोधार्थी, दिल्ली विश्वविद्यालय), प्रोफेसर गोपाल गुरु (जवाहर लाल विश्वविद्यालय), श्री गुंजल मुंडा (डॉक्टरल शोधार्थी, राँची विश्वदयालय), बलवीर अरोड़ा, उल्का अंजारिया, प्रोफेसर आशुतोष कुमार, के साथ-साथ प्रशासनिक अधिकारी मसलन श्री परमेश्वर अय्यर, श्री शक्ति सिन्हा, श्री टी.रघुनंदन, श्रीमति दीपा बघई, सुप्रसिद्ध समाजशास्त्री अभय कुमार दुबे एवं एनजीओ जगत से श्रीमति प्रियंका सिंह प्रमुख हैं।

इस समारोह में मुख्य वक्ता समाजशास्त्री अभय कुमार दुबे के अनुसार, उनके  अनुसार राग दरबारी हिन्दी साहित्य की उन रचनाओं में से एक है जो उत्तर औपनिवेशिक भारतीय शासक वर्ग की एक संरचना और कार्य पद्धति को प्रस्तुत करता है। दूसरी खास बात इस उपन्यास की यह है कि आधुनिकता और परंपरा के बीच का जो द्वंद है उसमें किस तरह से भारतीय आधुनिकता पर वे मूल्य ज्यादा हावी होते हुए दिखाई पडते हैं जिसमें वे परंपरा के काफी विकृत रुप के साथ समझौता करती हुई दिखाई पड़ती है।

इस समारोह के आयोजक प्रो. सत्यजीत सिंह के अनुसार, हमने एक साल पहले इस विचार पर काम करना शुरु किया कि किस तरह से बेबरवादी नौकरशाही आज भी ग्रामीण प्रशासन में अपनी जड़े जमाई हुई है। किस तरह से स्थानीय राजनीति व संस्थाएँ विकास संबंधी योजनाओं पर अपनी पकड़ स्थापित कर चुकी है । उन्होंने बहुत उत्साहित होते हुए कहा कि इस गोष्ठी का मुख्य विचार रागदरबारी है जिस पर हम सभी वर्ग के लोगों मसलन राजनीति वैज्ञानिक, पत्रकार, एनजीओ व शिक्षकों की राय जानने की कोशिश करेंगे। एवं अंतिम दिन राउंड टेबल टॉक में देश के शीर्षस्थ प्रशासनिक अधिकारियों से इसपर उनकी राय सुनेंगे। वे क्या करते हैं। क्या शिवपालगंज की घटना, पात्र, विकास के सपने व चुनौतियाँ समकालीन भारत में भी मौजूद हैं।

गौरतलब है कि 1968 में प्रकाशित श्रीलाल शुक्ल रचित उपन्यास उत्तर औपनिवेशिक नेहरुवादी नीतियों की माईक्रो-आलोचना के रुप में जानी जाती है। इसके पात्र मसलन वैद्य जी, रुप्पन बाबू, शनीचर, लंगड़ आदि ग्रामीण जीवन के जीवंत पात्र के रुप में दिखाई पड़ते हैं। यही कारण है कि मूल रुप से हिन्दी में लिखी गई कृति रागदरबारी का पंद्रह से अधिक भारतीय भाषाओं के साथ-साथ अंग्रेजी में भी अनुवाद किया गया। एवं इसकी बढ़ती हुई लोकप्रियता की अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि रागदरबारी को समाजशास्त्र, एंथ्रोपॉलोजी, व डेवलपमेंट स्टडीज़ सभी में संदर्भित किया गया है।

 

पंकज कुमार झा,

देवरती रॉय चौधुरी

 

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