पार्टी, पार्लियामेंट व प्रोपर्टी  पर गहराते संकट...............

 

उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति के माध्यम से लोकतांत्रिक राजनीति के उभरते प्रतिमान एवं उसके भीतर जाति-धर्म की राजनीति को समझना बेहद दिलचस्प पक्ष होगा। इस विषय पर बात करने के लिए हमारे साथ जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर डॉ. मणीन्द्र नाथ ठाकुर हैं। उनके साथ बातचीत कर रहे हैं डॉ. शशांक द्विवेदी,डॉ. पंकज कुमार झा  एवं डॉ. आशीष वत्स

 

 

 शशांक-चुनावों की उदारवादी राजनीति में एक विशेष भूमिका होती है. ऐसे में भारत के सामाजिक आर्थिक परिवेश में क्या लोकतान्त्रिक प्रणाली और संस्थाएं सुचारू ढंग से काम कर रही हैं?

मणीन्द्र-काफी हद तक सुचारु रुप से काम कर रही है विशेष जब हम औपचारिक व तात्विक लोकतंत्र की बात करते हैं उस स्थिति में जनतांत्रिक प्रणाली व संस्थाएँ एक हद तक काम कर रही हैं। परंतु संस्थाओं का जितना डिपनिंग होना चाहिए उतना नहीं हो पाया है। समाज में जिस तरह के जनतांत्रिक संबंध होने चाहिए व उसका जिस तरह से संस्थागत स्वरुप होना चाहिए वह नहीं दिखाई नहीं दे रहा है। चुनावों में जिस तरह से लोग चयन करते हैं उसे गौर करें तो उनमें लोकतांत्रिक मूल्य कम पाये जाते हैं। ऐसे में जो लोग भारतीय लोकतंत्र को सेलिब्रेट करते हैं व उसे एक सफलतम लोकतंत्र करार देते हैं मुझे उन पर शक होता है। जब हम समाज को लोकतांत्रिक होने की बात करते हैं तो उस तरह के समाज में पब्लिक लींचिंग की समस्या नहीं होनी चाहिए। जबकि वास्तव में समाज में पब्लिक लींचिंग की घटनाएँ दिखाई पड़ती है। भारतीय समाज में पब्लिक लींचिग का आना हमें लैटिन अमेरिका में फासिवाद के आने की याद दिलाता है।

शशांक-उत्तर प्रदेश में होने वाले चुनाव को आप किस तरह से देखते हैं? क्या ये चुनाव आज के दौर के प्रभावशाली विमर्श, जो दक्षिण पंथ से प्रभावित है, को किसी प्रकार से चुनौती दे पाने में सफल होगा?

मणीन्द्र-उत्तर प्रदेश का चुनाव व राजनीति भावी राजनीति के लिए नियामक होगी। क्योंकि ऐसा दिखाई पड़ता है कि उत्तर प्रदेश में दक्षिणपंथी दलों के प्रति लोगों का झुकाव में कमी आई है। उत्तर प्रदेश में दक्षिणपंथ का प्रभाव काफी लंबे समय से चला आ रहा है, परंतु ऐसी उम्मीद जगी है कि यह प्रभाव केवल उनके समर्थकों को प्रभावित कर सकता है, गैर-समर्थकों को उस उम्मीद के बल पर खींच पाना मुश्किल प्रतीत होता है। इस रुप में उत्तर प्रदेश की राजनीति भारत की भावी राजनीति के लिए एक नियामक  बनती नजर आती है, यदि दक्षिणपंथ से गैर- प्रभावित यह समर्थक एक दूसरे से आपस में गठजोड़ करते हैं।

आशीष-आम तौर पर देखा गया है कि तीसरी दुनिया के देशों में धर्म और राजनीति के बीच का सम्बन्ध बेहद जटिल है. इसका मुख्य कारण क्या है? भारत के सन्दर्भ में और विशेष कर के उत्तर प्रदेश के चुनावों के सन्दर्भ में धर्म की क्या भूमिका होगी?

मणीन्द्र-धर्म और राजनीति का संबंध तीसरी दुनिया में ही नहीं पहली दुनिया में भी काफी जटिल है। इसे हाल में हुए अमेरिकी चुनाव के विशेष संदर्भ में हम देख सकते हैं। धर्म और राजनीति को जब हम उत्तर प्रदेश के संदर्भ में देखें तो स्पष्ट है कि यह सूबा दक्षिणपंथ राजनीति की गढ़ रही है। जिसमें रामजन्म भूमि का होना सबसे महत्वपूर्ण है। दिलचस्प है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति काफी हद कर इसके इर्द-गिर्द घूमती रही है। संभावना है कि इस बार के चुनाव में भी दक्षिणपंथी राजनीति इसके आस-पास ही मुद्दों को प्रस्तुत करेगी। 2013 में धार्मिक मुद्दों को भड़काने वाले दंगे भी इस इलाके में हुए हैं। इसी तर्ज़ पर कॉम्युनल पॉलिटिक्स इस बार उत्तर प्रदेश में धर्म के आस-पास अपनी भूमिका निभाएगी। परंतु यह सवाल यहाँ महत्वपूर्ण है कि इसे धर्म की राजनीति कहना कठिन होगा। बल्कि यह धार्मिक पहचान की राजनीति (Politics of Religious identity) है। पहचान को लेकर हमेशा से राजनीति होती रही है, चाहे वह जाति हो अथवा भाषा। उत्तर प्रदेश में पहचान की राजनीति का प्रभुत्व है। उत्तर प्रदेश में एक अस्मिता, दूसरी अस्मिता को काटने की कोशिश करती है, यही उत्तर प्रदेश में चल रहा है।

आशीष-क्या भारत में लोकतान्त्रिक चुनाव समूह की प्रतिभागिता और उनकी अस्मिता को आकर दे पाने में ज्यादा सहज है और इस तरह से एक व्यक्ति एक वोट के उदारवादी लोकतंत्र के मूल सिद्धांत को ख़ारिज करता है?

मणीन्द्र-यह बात सही है जैसा कि रजनी कोठारी भी कहते हैं कि भारतीय संदर्भ में जनतांत्रिक प्रणाली के अंतर्गत कम्युनिटिज की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। जैसा कि जातिगत कम्युनिटिज़ के रास्ते  जनतंत्र समाज तक पहुँचा है। परंतु यह भी नहीं कहा जा सकता है कि भारत एक व्यक्ति-एक वोट’ (one person-one vote) की संकल्पना को खारिज़ करेगा। क्योंकि हमने देखा है कि कई बार सामाजिक  समीकरण के हिसाब से जो चुनावी परिणाम आने चाहिए वैसा नहीं आता है। इसका मतलब है कि दोनों के बीच हम कहीं घूमते रहते हैं और तब यह निर्भर करता है कि उस समय मुद्दा वहाँ क्या है? कई बार  लोग कहते हैं कि भारतीय राजनीति में जनता समुदायिक आधार पर ही वोट डालती है ऐसी बात भी बिल्कुल सही नहीं है। यही कारण है कई बार चुनावी विश्लेषण सही नहीं हो पाते हैं। और जनता का उस वक्त अपना एक अलग इंटेलिजेंस भी दिखाई पड़ता है।

शशांक-क्या भारतीय राजनीति के जो स्थापित मापदंड थे, जैसे की धर्मनिरपेक्षता और सहिष्णुता, वे बदल रहे हैं? इसका नया अवतार क्या है? आगामी चुनाओं में इसका क्या प्रभाव होगा?

मणीन्द्र-मुझे लगता है कि भारतीय राजनीति में यह थोड़ा उथल-पुथल का समय है, चीज़े तेज़ी से बदल रही हैं। जैसे-जैसे पूँजीवाद की जड़े गहरी हो रही है, वैसे-वैसे राजनीति के मापदंड बदलेंगे, हमारे आदर्श भी बदलेंगे। वर्तमान उत्तर प्रदेश की चुनाव के संदर्भ में हम देख रहे हैं कि अखिलेश भी डेवलपमेंट मॉडल की ही बात करे हैं। अभी हाल ही में पार्टी के भीतर जिस तरह से कलह हुआ वह भी एक तरह से डेवलमपेंट मॉडल को रेखांकित करने व पुरान मॉडलों जैसे जाति को पीछे करने की कोशिश है। यह तय है  कि आने वाले समय में जो नया वर्ग व पीढ़ी है  राजनीति में प्रवेश कर रहे हैं अथवा वोटर हैं उनके लिए भी उन्हें नये प्रतिमान गढ़ने पड़ेगे।

 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी जी लिए जो प्रचार किया गया था उसमें भी व्यक्ति के रुप में एक आईकॉन को क्रिएट किया गया था, जो आईकॉन अभी भी कई लोगों के लिए महत्वपूर्ण है। उसी तरह की आईकॉन वाली छवि अखिलेश के लिए भी स्टेट लेवल पर लोगों को दिखता है।

संभव है कि वोटिंग फिर भी जाति व समाज-बिरादरी के आधार पर हो परंतु जाति व समाज के बीच के समन्वय का जो आर्गुमेंटश है वह डेवलपमेंट पर आधारित होगा ऐसा मेरा मानना है।

शशांक-भारतीय राजनीति के नए प्रतिमान क्या हैं? क्या ये उभरते हुए नए प्रतिमान उत्तर प्रदेश के चुनाव को प्रभावित करेंगे?

मणीन्द्र-1947 के बाद भारतीय राजनीति का जो रुप गढ़ा गया इसमें कुछ महत्वपूर्ण आयाम थे जिसमें दल, संसद, संपत्ति (Party, Parliament and Property) का मॉडल देखा जा सकता है। अभी पिछले दिनों इन तीनों में ही संकट देखा जा सकता है। दलों में आंतरिक चुनाव व आंतरिक प्रभाव खत्म होता जा रहा है। प्रत्येक पार्टी एक कॉरपरेट के रुप में तब्दील होती जा रही है। प्रत्येक पार्टी में एक सीईओ है चाहे वह परिवार का कोई आदमी हो या फिर उसे पार्टी के द्वारा स्थापित किया जाए। सभी पार्टियों में एक पोस्टर ब्याय होता है। आम आदमी पार्टी में भी केजरीवाल के अलावा किसी अन्य का चेहरा आप नहीं देख सकते हैं। यह एक कॉरपोरेट मॉडल की तरह है, जब कोई पार्टी बना रहा है तो वह एक स्टार्ट-अप मॉडल की तरह कार्य करता है। अगर ऐसा होगा तो प्रतिनिधित्व का पूरा मॉडल ही संकट में चला जाया। संसद का जहाँ तक सवाल है उसमें भी क्राईसिस देखा गया है। नियम कानून की प्रक्रिया में ना तो नेताओं का प्रशिक्षण होता है और न ही वे गंभीर होते हैं। जिस तरह से न्यायपालिका का संसद के मामलों पर हस्तक्षेप बढ़ा है वह भी चिंता की बात है। अब तो बहुत सारे कानून संसद व असेंबली के बाहर ही कानून बनते हैं। स्पष्ट है कि प्रोपर्टी रिजिम का भी एक बड़ा खतरा है। समाजवादी व्यवस्था ने नीति निर्देशक तत्वों के रुप में जिस प्रकार से संपत्ति के मोनोपॉली का विरोध किया वह अब समाप्त होने लगी है। नोटबंदी का प्रमुख असर यह भी रहा है कि कुछ चुनिंदा हाथों में संपत्ति का केन्द्रीकरण देखने को मिला है। यह सभी चीज़े नई दिशा में जाने का इशारा हमें कर रही है, मुझे नहीं लगता है कि इसके लिए भारतीय समाज तैयार है। एवं यह एक संघर्ष की तरफ बढ़ता हुआ प्रतीत होता है। इसलिए मैं यह कहता हूँ कि हमारे लोकतंत्र के तात्विक स्वरुप पर जो लोग सेलिब्रेट कर रहे हैं उन्हें यह देखना होगा कि हम क्राईसिस की तरफ बढ़ रहे हैं। मुझे इस बात की साफ संभावना दिख रही है कि विकास के नाम पर सर्वसत्ताधिकारी शासन उत्तर प्रदेश व केन्द्र दोनों ही स्थानों पर दिखाई देने वाला है।

 

शशांक  द्विवेदी, जवाहर लाल नेहरु यूनिवर्सिटी से राजनीति विज्ञान में पीएचडी हैं। आप पूर्वांचल की राजनीति व धर्म विषय पर विशेष दक्षता रखते हैं।

पंकज कुमार झा, दिल्ली  यूनिवर्सिटी से राजनीति विज्ञान में पीएचडी हैं। आप इलेक्शन स्टडीज में विशेष रूचि रखते है.  आप IESAI टीम के कोर सदस्य है| 

आशीष वत्स, चौधरी चरण सिंह यूनिवर्सिटी से राजनीति विज्ञान में पीएचडी हैं। आप IESAI टीम से जुड़े हुए हैं।

 

 

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