पूर्वांचल की राजनीति पर धर्म व जाति का विशेष प्रभाव रहा है, चुनाव के आते ही इन पर चर्चाएँ शुरु हो गई हैं। इसके साथ-साथ अस्मिता की राजनीति व विकास के सवाल पर भी बातचीत पब्लिक स्फेयर में हो रही हैं। इस विषय पर बातचीत करने के लिए हमारे साथ आज जवाहर लाल यूनिवर्सिटी से प्रोफेसर संजय पांडे हैं। उनसे बातचीत कर रहे हैं जेएनयू के शोध-छात्र संतोष कुमार झा व इस बातचीत को समन्वित कर रहे हैं पंकज कुमार झा अंकित कुमार

 

 

PKJ -पूर्वांचल की राजनीति की मुख्य विशेषताएं क्या है? आगामी उत्तर प्रदेश चुनाव के संदर्भ में आप इन विशेषताओं को कैसे आँकते हैं?

SP-सांस्कृतिक रुप से पूर्वांचल की अपनी एक पहचान रही है। भोजपुरी उसकी अपनी एक भाषा रही है। उत्तर प्रदेश के अन्य इलाके से यहाँ के तौर-तरीके, त्यौहार व खानपान अलग है। कुछ हद तक इसकी समानता बिहार  विशेष  रुप से पश्चिम बिहार के साथ है। बावजूद इसके पूर्वांचल की जो धाराएँ व विशेषताएँ हैं, वह कमोवेश वही हैं जो उत्तर प्रदेश के बाकी भाग में देखने को मिलती है। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से जुड़े प्रोफेसर राबर्ट गैलनर के साथ हम एक  शोध कर रहे है। इस शोध के सिलसिले में हमलोग गोरखपुर, कुशीनगर का दौड़ा कर रहे थे। हमने कुशीनगर स्थित महात्मा बुद्ध  डिग्री कॉलेज में छात्रों व शिक्षकों के समूह को संबोधित किया। वहाँ गैलनर इस सवाल को जानने के लिए बेहद उत्सुक थे कि क्या पूर्वांचल के लोगों में पृथक राज्य बनाने  को लेकर कोई उत्साह है।  जब मैंने उनसे रायशुमारी किया तो वह बहुत उग्रता पूर्वक हाथ खड़े करके नही-नही का नारा लगाने लगे।  तात्पर्य यह था कि वे अलग पूर्वांचल देखना नहीं चाहते हैं। उनके अनुसार पूर्वांचल उत्तर प्रदेश का अभिन्न अंग है, और वह उसे विस्तृत भारत के अंग के रुप में ही देखना चाहते हैं। इस रुप में पूर्वांचल की राजनीति की एक अलग पहचान होगी यह कहना मुश्किल है, लेकिन कुछ विशेष मुद्दे मसलन जाति की राजनीति का यहाँ अलग स्वरुप देखा जा सकता है। मेरा मानना है कि जिस प्रकार से ब्राह्मण सहित अगड़ी जातियों का प्रभुत्व पूर्वांचल की स्थानीय राजनीति में देखा गया है वह बाकी उत्तर प्रदेश में नज़र नहीं आता है।

 

PKJ- जाति और धर्म का समिश्रण उत्तर प्रदेश की राजनीति एवं विशेष रुप से पूर्वांचल की राजनीति को किस तरह से प्रभावित करते हैं?

SP-मुझे लगता है यहाँ आपका विशेष रुप से तात्पर्य अयोध्या व गोरखपुर स्थित गोरखनाथ पीठ या  मंदिर व उसके स्थानीय प्रभाव से संबंधित है। जिस प्रकार का प्रभाव व प्रभुत्व इस पीठ का पूर्वांचल व विशेष रुप से गोरखपुर में रहा है, वह अपने आप में महत्वपूर्ण है। पिछली पाँच चुनावों में गोरखनाथ मंदिर के महंत योगी आदित्यनाथ यहाँ से चुनाव जीतते आ रहे हैं। इससे पूर्व उनके पूर्ववर्ती महंत अवैद्यनाथ ने दो चुनाव में विजय प्राप्त किया था अवैद्यनाथ जी के एक पूर्ववर्ती और थे जिन्होंने 1969 में गोरखपुर से  चुनाव से जीता था परंतु  एक वर्ष बाद उनकी मृत्यु हो गई। इस प्रकार हम देखते हैं कि पिछले आठ चुनावों से गोरखनाथ पीठों का जिस प्रकार से इस इलाके में प्रभुत्व रहा है, वह जरुर पूर्वांचल की राजनीति में एक अभिनूतन लक्ष्ण के रुप में है।

SKJ- गोरखनाथ पंथ/ धर्म के बारे में आप विस्तार से बताएँ?

SP- गोरखनाथ पंथ या धर्म के बारे में मैं महत्वपूर्ण रुप से कहना चाहूँगा कि इसके प्रभाव व इतिहास  से   जुड़ी कई विडंबनाएँ व विरोधाभास रही है। इस आंदोलन की शुरुआत ब्राह्मणवादी धर्म के विरोध के प्रोस्टेट मूवमेंट के रुप में हुआ था। इनका आंदोलन जाति-पाति का विरोधी रहा है, इससे आगे रहा है, इससे इतर रहा है। पारंपरिक गोखनाथ पीठ के अंतर्गत कर्मकांडों को विशेष रुप से तरज़ीह नहीं दी गई है। आज के दौर में विरोधाभास यह है कि वैसा आंदोलन जो उन सबका विरोध करता था वह आज की राजनीति में विशेष रुप से हिन्दुवादी राजनीति का प्रणेता बन गया है। परंतु हमें यह भी देखना पड़ेगा कि कुछ मायनों में उन्होंने अपनी परंपराओं का निर्वाह भी किया है। आज जब आप  पीठ जायेंगे तो देखेंगे कि वहाँ सभी जातियों का प्रतिनिधित्व है। इस प्रकार, इतना तो कहा जा सकता है कि वहाँ की पीठ पर ब्राह्मणों का वर्चस्व नहीं देखा गया है। हाल के दिनों में देखा गया है कि पिछड़े, अति-पिछड़े वर्गों के साथ-साथ दलित लोकबाग का भी जुड़ाव मठ के प्रति बढ़ा है। चूँकि महंत हिन्दुत्व की राजनीति को विशेष प्रोत्साहन दे रहे हैं वैसे में ब्राह्मणों का भी स्वाभाविक झुकाव पीठ व महंत के  प्रति देखा जा सकता है। दिलचस्प है कि पिछले तीन महंत क्षत्रिय जाति से संबंधित हैं इसलिए राजपूत जाति के लिए भी यह एक ध्रुवीकरण का केन्द्र बिंदु के रुप में दिखाई पड़ता है।

SKJ- योगी आदित्यनाथ की छवि के बारे में विस्तार से बताएँ?

SP- योगी आदित्यनाथ जिसे अब महंत आदित्यनाथ कहा जाता है, उनकी छवि इस पूरे इलाके में  काफी प्रभावशाली, कद्दावर व ताकतवर नेता के रुप में रही है। वे स्थानीय रुप से एक सरकार के रुप में कार्य करते हैं। कार्य नहीं करने वाले अफ़सरों को बुलाकर खूब फजीहत भी करते हैं। इससे लोगों के अंदर उनकी प्रभावी परंतु लोकप्रिय छवि देखी जा सकती है। लोग भी चाहते हैं कि उनका नेता इतना प्रभावशाली हो कि वह लोकबाग की तमाम समस्याओं को दूर कर सके। आदित्यनाथ के द्वारा कई शैक्षणिक संस्थान व अस्पतालों की भी स्थापना की गई है। इस प्रकार,  यह कहा जा सकता है कि योगी आदित्यनाथ की छवि  इस इलाके में बहु-मिश्रित दिखाई दे रही है।

SKJ- क्या पूर्वांचल के मुस्लिमों में जाति आधारित वोटों का बँटवारा है?

SP- हालांकि इस्लाम धर्म जाति-व्यवस्था की स्वीकार्यता को नकारता है। बावजूद मुस्लिम धर्म के भीतर जाति व्यवस्था के विभाजन को देखा जा सकता है। मुस्लिमों में जहाँ सैय्यद व शेख जैसी अगड़ी जातियाँ मौजूद हैं वहीं कामगार, कारीगर व विशेष रुप से बुनकर जैसे पिछड़ी जातियाँ भी हैं। पूर्वांचल में गोरखपुर, खलीलाबाद के इलाकों में उनकी बड़ी आबादी निवास करती है। महत्वपूर्ण है कि इनका संबंध पीठ के साथ बहुत जटिल दिखाई पड़ता है। परंपरागत रुप से पीठ के आस-पास निवास करने वाली बुनकरों व जुलाहे की आबादी पीठ का समर्थन करती रही है। हालांकि अभी के वर्तमान पीठाधीश को लेकर जरुर उनकी दृष्टि बदलती दिख रही है। विगत दशकों में जिस तरह से राजनीति में हिन्दुवाद का रेडिकल स्वरुप उभरा है एवं इन इलाकों में सांप्रदायिक तनाव की स्थिति भी देखी गई है। जिससे उनमें पीठ के प्रति थोड़ा असंतुष्टि दिखाई पड़ रही है। हालांकि यह असंतोष कैसे चुनावी परिणाम को प्रभावित करेगा इसको और गहराई से देखने की जरुरत है।

 

SKJ- दलितों और मुसलमानों के मध्य क्या किसी प्रकार का संघर्ष है जो चुनावी समीकरण को प्रभावित करता है?

SP- पिछड़ी जातियों व दलितों के बीच तो संघर्ष की वारदातों को सुना गया है। परंतु दलित-मुस्लिमों के बीच सीधा संधर्ष देखने को नहीं मिलता। पिछले 2 दशकों में मुसलमानों ने हालांकि की बसपा को वोट भी दिया है। वैसे यह हमारी परंपरागत विडसम रही है कि सपा की पूरी राजनीति में मुस्लिम व दलितों को पंरपरागत रुप से उनके समर्थक के रुप में देखा गया है। इसी तरह का साफ समीकरण पूर्वाचंल की राजनीति के बारे में भी देखा जा सकता है। परंतु यह कहना अभी भी कयास लगाने के बराबर है कि क्या दलित व मुस्लिम इस बात उत्तर प्रदेश में एक साथ आकर वोट डालेंगे?

SKJ एक समय में पूर्वांचल की राजनीति पर कांग्रेस और वाम दलों का विशेष भूमिका थी जो कालांतर में हाशिये पर चले गए. इसका आप क्या कारण मानते हैं?

SPआजादी के बाद से हालांकि पूर्वांचल की राजनीति में कांग्रेस का उतना प्रभुत्व नहीं रहा है जितना उत्तर प्रदेश के बाकी हिस्से में रहा है। समाजवादी दलों का निश्चित तौर पर यहाँ अधिक प्रभाव रहा है। मजदूर कृषक पार्टी का विशेष रुप से पूर्वांचल के इलाके में काफी प्रभाव रहा है। पहले इस इलाके में  विशेष रुप से देवरिया, कुशीनगर, आजमगढ़ से लेकर गोरखपुर व बस्ती तक के इलाके तक समाजवादियों का विशेष प्रभाव रहा है। इस संदर्भ में  कद्दावर नेता शिब्बन लाल सक्सेना इस इलाके में समाजवादी आंदोलन की नुमाइंदगी करते रहे हैं। इस इलाके में समाजवादी राजनीति को बढ़ाने का मुख्य श्रेय गन्ना राजनीति को भी जाता है। गन्ना के मूल्य किसानों की समस्याएँ व मजदूरों के हालात से जुड़ा होने के कारण समाजवादियों का मुख्य लगाव उसके प्रति था। परंतु समकालीन राजनीति में गन्ना की राजनीति व चीनी मिलों के बंद होने की स्थिति में इसके प्रभाव में लगातार कमी आई है। इसके साथ-साथ अस्सी के दशक में मंडल की राजनीति व नब्बे के दशक में मंदिर की राजनीति के उभार ने भी उसकी दिशा को बदला।

SKJ- अस्मिता की राजनीति के उभार के बाद पूर्वांचल में सपा और बसपा जैसे दल मजबूत हुए और लोकतान्त्रिक प्रक्रियाओं पर उसका प्रभाव भी पड़ा. नि: वर्तमान में विकास की राजनीति का विमर्श जाति  की राजनीति पर क्या भारी पड़ रहा है?

SP- 2014 के चुनाव से  ही यह माना जाने लगा था कि जाति-धर्म की राजनीति से इतर विकास की राजनीति पर बल दिया जाना चाहिए। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जनता के बीच जिस तरह से विकास पुरुष की छवि प्रस्तुत किया है उसे इसी संदर्भ में हम देख सकते हैं। पिछले 2 वर्षों में उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति में ठीक इसी तरह अखिलेश की एक विकास को चाहने वाले मुख्यमंत्री के रुप में प्रस्तुत किया है। यूपी को घूमने से आपको इस बात का पता चल जायेगा कि सबसे अधिक होर्डिंग विकास के दावों को ही इंगित कर रहे हैं। इस संदर्भ में हमें देखना होगा कि पूर्वाचंल में पीठ ने भी अपनी राजनीति में केवल धर्म पर बल न देते हुए शिक्षा,स्वास्थ्य आदि क्षेत्रों के विकास पर भी बल दिया है। पूर्वांचल की हाल की अपनी रैली में प्रधानमंत्री ने भी फर्टीलाईजर एवं ऐम्स की शाखा को गोरखपुर में खोलने की घोषणा करके विकास के दावे पर मुहर लगा चुके हैं। स्पष्ट  है कि केन्द्र व राज्य दोनों को ही यह लगने लगा है कि केवल जाति-धर्म की राजनीति से काम नहीं चलने वाला, बल्कि हमें उन सबसे बीच विकास का एक स्पेशल बीट भी देना  होगा।

 

प्रोफेसर संजय पांडे, स्कूल ऑफ रशियन स्टडिज़, जेएनयू में प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं।

संतोष कुमार झा, स्कूल ऑफ मंगोलियन स्टडिज़, जेएनयू में पीएचडी शोध-छात्र हैं।

पंकज कुमार झा, राजनीति विज्ञान विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय से पीएचडी डिग्री प्राप्त हैं।

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