संजीव कुमार, नेहा सिंह & रौशन कुमार शर्मा 

चुनावी लोकतंत्र के बदलते प्रतिमान एवं उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2007 के विशेष संदर्भ में हमारी संस्था IESAI ने 9 फरवरी 2017 को जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रो. विवेक कुमार से साक्षात्कार के सिलसिले में मुलाकात की। प्रो. कुमार से बात कर रहें है श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालयदिल्ली विश्वविद्यालय में कार्यरत सहायक प्राध्यापक संजीव कुमार एवं जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के Centre for Study of Discrimination and Exclusion की शोध-छात्रा नेहा सिंह हैं-

प्रो. कुमार संप्रति जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के Social Science के अन्तर्गत Centre for Study of Social System में कार्यरत हैं। उन्होंने एक अतिथि (Visiting) प्राध्यापक के रूप में कोलंबिया विश्वविद्यालय में वर्ष 2010 में ‘Social Exclusion and Inclusion in Indian Society’ शीर्षक से अध्यापन किया है। उन्होंने अनुसंधनान एवं अकादमिक क्षेत्र में देश-विदेश में अनगिनत फैलोशिप एवं पुरस्कार/सम्मान प्राप्त किया है। वह भारतीय राजनीति और राजनीतिक समाजशास्त्र के विशेषज्ञ हैं। विशेष रूप से दलित बहुजन राजनीतिबहुजन समाज पार्टी एवं भारत में जाति एवं धर्म से जुड़े हुए सिद्धान्त एवं मुद्दों पर आपकी विशेषज्ञता सर्वविदित है। आपने कई पुस्तकों एवं शोध-ग्रन्थों पर काम किया है। उनमें प्रमुख हैं 

·         ‘Dynamics of Change & Continuity in the Age of Globalization : Voices from the Margin” (2009)

·         “India’s Society Revolution” (2016)

·         Dalit Leadership in India (2002) and

·         Dalit Assertion & Bahujan Samaj Party (2001)

प्रो. कुमार ने विभिन्न सरकारी-कार्यक्रमों में समिति सदस्य एवं सलाहकार सदस्य के रूप में भी अपनी सेवा प्रदान करते रहे हैं।

संजीव कुमार - महाशयअगर हम वर्तमान समय में भारत में लोकतंत्र का मूल्यांकन करें तो पाते हैं कि जनतामीडिया यहाँ तक कि राजनेता भी इसी गुत्थी में उलझे हुए हैं कि कौन-सी पार्टी चुनाव जीत रही है और कौन हार रही हैचुनाव पूरी तरह से कुछ खास मुद्दों जैसे जातिधर्म तक सिमट कर रह गयी है। यद्यपि हाल के दिनों में विधि-व्यवस्था एवं विकास जैसे मुद्दों ने भी अपनी प्रधानता स्थापित की है। अगर हम राजनीतिक नैतिकता की बात करेंजैसा कि बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर ने कहा थाहमें लोकतंत्र में अपने साथ के लोगों एवं उनकी भावना का सम्मान करना चाहिए। उस लिहाज से अगर देखा जाए तो हमारा लोकतंत्र वर्तमान समय में उस लक्ष्य को कितना प्राप्त कर सका है या फिर हम और दूर हो गये हैं?

प्रो. विवेक कुमार - अगर आप यह समझते हैं कि भारत एक लोकतंत्र हैतब आपको यह निश्चित रूप से जानना चाहिए कि भारत महज एक राजनीतिक लोकतंत्र है और जब हम राजनीतिक लोकतंत्र की बात करते हैं तो इसका मतलब यह है कि जनता को मतदान करने का अधिकार प्रदान किया गया है। एक व्यक्तिएक मतएक व्यक्तिएक मूल्य की बात की गयी है। बाबा साहब अम्बेडकर ने 26 नवम्बर, 1949 को कहा था कि हम भारतवासी 1 जनवरी, 1950 से एक विरोधाभास (Contradiction) की दुनिया में प्रवेश करने जा रहे हैं। जहाँ हमें राजनीति में लोकतंत्र का दीदार तो होगावहाँ हम सब बराबर (समान) महसूस करेंगे। लेकिन सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र में हम असमान रहेंगे। इसीलिएहमें तेज गति से यह प्रयास करना चाहिए कि हम अपने राजनीतिक लोकतंत्र को सामाजिक लोकतंत्र में परिवर्तित कर सकें। तदोपरांत राजनीतिक एवं सामाजिक दोनों लोकतंत्र को आर्थिक लोकतंत्र के स्वरूप में विकसित कर सकेंविस्तारित की जा सकें। लेकिन पिछले वर्षों में जो कुछ भी हुआ है, हम देखते हैं राजनीतिक लोकतंत्र सिमटकर चुनाव तक सीमित रह गया है... जिसकी बात लोग कर रहे हैं। अब चूंकि हमारे यहाँ चुनाव होते हैं इसलिए हम लोकतंत्र हैं। लेकिन लोगों की सहभागिता निर्णय लेने में कहाँ हैक्या उन्हें वास्तविक रूप में विश्वास में लिया जाता हैचुनाव दर चुनाव करोड़पतिमाफिया चुनावी राजनीति में प्रवेश करते जा रहे ळैं... मीडिया प्रवेश कर रहा हैलेकिन लोग छोटे से घेरे में सिमटकर रह गये हैंजिससे उनमें एक विशेष प्रकार का हतोत्साह नजर आ रहा हैजो कि दिन-प्रतिदिन इस कड़ी को कमजोर कर रहा है।

विभिन्न राजनीतिक पार्टियों के घोषणा-पत्र से यह प्रमाणित होता है कि ... मानों यहाँ कोई विचारधारा नहीं है। प्रत्येक राजनीतिक पार्टीदक्षिणपंथी से लेकर वामपंथी तकउपहार पर उपहार बाँट रहे हैं... प्रेशर कुकार से लेकर इंटरनेटवाई-फाईस्मार्टफोन ... क्या नहीं बाँटा जा रहा है। इससे बड़ी विडम्बना क्या हो सकती है कि पंजाब जैसे सम्पन्न प्रदेश में पार्टियाँ दूध और घी देने की बात कर रही है। इस प्रकार हम अपने लोकतंत्र को सिमटकर घी तक ला रहे हैं। अगर यह लोकतंत्र है तो हमें अलग तरीके से सोचना होगा। वहीं दूसरी तरफलोकतंत्र के दूसरे आयाम को देखा जाए तो उसने निश्चित रूप से आवाजविहीन लोगों को अवसर प्रदान किया है। जैसा कि आप जानते हैं कि उनके पास कोई राजनीतिकआर्थिकसामाजिकशैक्षणिकधार्मिक अधिकार नहीं था .... लेकिन भारत के संविधान द्वारा उन्हें ये अधिकार प्रदत्त किये गये हैं। 50 या 70 वर्ष पहले उन्हें चुनाव लड़ने से रोका जाता थाअब उन्होंने अपनी राजनीतिक पार्टियाँ बना ली हैं। वे चुनाव लड़ रहे हैं... वे मुख्यमंत्री बन रहे हैं... वे भारत के राष्ट्रपति बने हैं। इस प्रकार भारत में लोकतंत्र एक अलग आयाम दृष्टिकोण है।

नेहा सिंह - महाशयइन दिनों कुछ नये मुद्दें जैसे कि विमुद्रीकरण एवं आतंकी हमले चर्चा में हैं। इन मुद्दों का उत्तर प्रदेश चुनाव में क्या असर पड़ेगाविभिन्न पार्टियों के बीच लड़ाई (Contest) का वास्तविक मुद्दा क्या होगात्रिकोणात्मकद्विपक्षीय या किसी प्रकार की कोई हवा चल रही हैपार्टी विशेष के पक्ष में?

प्रो. विवेक कुमार- जहाँ तक विमुद्रीकरण का मुद्दा है इसने तृणमूल (Grass Root) को काफी प्रभावित किया है। चूँकि मैं उत्तर प्रदेश से हूँमैं कह सकता हूँ... समाज का गरीब तवका (वर्ग)ग्रामीण वर्ग बुरी तरह से प्रभावित हुआ है। उनके लिए यह एक असहनीय अभ्यास था। लेकिन इससे भी बड़ी विडम्बनादुर्भाग्यपूर्ण यह रहा कि मुख्यधारा की मीडियाजो कि कॉरपोरेट मीडिया हैने इस पीड़ा एवं दर्द को दिखाना उचित नहीं समझा। यहाँ तक कि सत्ता मे बैठे राजनेता भी इसे स्वीकार करने से बचते रहें... आज भी वे इस बात को स्वीकार नहीं कर रहे हैं कि विमुद्रीकरण पूरी तरह से बेकार था और सर्वजन के लिए एक अभिशाप था। वर्तमान चुनाव में त्रिकोणीय मुकाबला चल रहा है। जिसमें बहुजन समाज पार्टी एक मात्र ऐसी पार्टी है जो पहले एक नेत्री के नेतृत्व में चुनाव लड़ रही है। इसके अलावा भाजपा हेसपा-कांग्रेस गठबंधन है।

नेहा सिंह- महाशयजैसा कि आपने अभी कहा बसपा अकेले एक नेत्री की अगुवाई में चुनाव लड़ रही है ... इसलिए (इस प्रकार) आप मायावती की राजनीति को अन्य पार्टियों से अलग कैसे देखते हैंअम्बेडकर और कांशीराम के दर्शन एवं योगदान...

प्रो. विवेक कुमार- सर्वप्रथममुझे उत्तर प्रदेश की राजनीति पर थोड़ा प्रकाश डालने दीजिए। भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में राष्ट्रीय पार्टियाँ इस निर्वाचन को व्यक्ति आधारित (Personality based Election) बनाने की कोशिश कर रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के करिश्माई व्यक्तित्व को आधार बनाकर भारतीय जनता पार्टी चुनाव जीतना चाह रही है। उन्हें राष्ट्रीय नेता के रूप में स्थापित कर उनके नाम पर मत प्राप्त करने की कोशिश हो रही है। लेकिन समस्या यह है कि भाजपा का यह खेवनहार स्वयं चुनाव नहीं लड़ रहा है। उसके अलावा दो ऐसे व्यक्तित्व हैं जो चुनाव लड़ रहे हैं - मायावतीसमाजवादी पार्टी। चौथे राहुल गाँधी हैंजो चुनाव नहीं लड़ रहे हैं। इस प्रकारवास्तव में दो ही व्यक्ति  चुनाव लड़ रहे हैं। इसीलिएमैं देख रहा हूँ कि बसपा सबसे उपयुक्त राजनीतिक संगठन है जो उत्तर प्रदेश चुनाव लड़ रही है। मैं ऐसा क्यों कह रहा हूँ ... यहाँ नेतृत्व का कोई मुद्दा नहीं हैएकमात्र स्वीकार्य नेता मायावती हैं। दूसरायह पहली ऐसी पार्टी है जिसने अकेले दम पर सबसे पहले सभी 403 निर्वाचन क्षेत्रो में अपना प्रत्याशी घोषित कर चुकी थी। अर्थात् उन्हें विश्वास था कि वे सांगठनिक रूप से इतने मजबूत हैं कि अपने दम पर चुनाव लड़ सकते हैं। बाकि तमाम पार्टियाँ यत्र-तत्र गठबंधन कर रही है। वे विस्मित हैं कि उनका नेता कौन होगामुख्यमंत्री प्रत्याशी कौन होगाभाजपा ने यह तय नहीं किया है कि चुनाव जीतने की स्थिति में उनका नेता कौन होगाजहाँ तक समाजवादी पार्टी का प्रश्न है तो वे एक माह पहले तक यह तय नहीं कर पा रहे थे कि चुनाव किस ‘Symbol’ पर लड़ेंगे? इस परिप्रेक्ष्य मेंमैं यह मानकर चल रहा हूँ कि बसपा अभी सांगठनिकसंरचनात्मक एवं प्रत्याशी चयन के लिहाज से नंबर एक पार्टी है। जहाँ तक इन दिनों में बसपा की उपलब्धि का सवाल है तो उसे निम्न तरीकों से समझा जा सकता है। प्रथमसबसे पहले आपको उन उपलब्धियों को समझने के लिए एक ढांचा (Frame Work) निर्माण करना होगा। यह ढांचा तात्कालिक इतिहास का हो सकता है ... जब से बसपा काम कर रही है। दूसराआपको उन उपलब्धियों को दिखाना होगा जो स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ रही है। इस लिहाज से हमें भारतीय समाज के पदानुक्रम व्यवस्था को समझना पड़ेगाजो कि भेदभावजाति आधारित व्यवस्था में बँटा हुआ है। यहाँ तक कि उत्तर प्रदेश में बसपा का काल इतिहास के दृष्टिकोण के काफी कम है। 2500 वर्ष के भारत के इतिहास में 20-25 वर्षों में बसपा ने उत्तर प्रदेश के समाज के सामाजिक संरचनापदानुक्रम संरचना कि पुनर्व्यख्या करने का काम किया है। समाज के जो लोग एकसाथ बैठने का अधिकार नहीं रखते थेवे अब देश चला रहे हैं। यह बसपा का सबसे बड़ा योगदान है। बसपा एक लोकतांत्रिक राजनीतिक पार्टी रही है। बहुजन आंदोलन ने हाशिये पर खड़े लोगों को मुख्यधारा में लाकर लोकतंत्र को मजबूती प्रदान करने का काम किया है। अन्यथाआप जानते हैंवे कहीं भी जा सकते थे। वे अपने हाथों में लाल झंडा थाम सकते थे। वे कोई छोटे-मोटे काम कर सकते थे। लेकिन बसपा आंदोलन ने इन लोगों को राजनीतिक व्यवस्था का हिस्सा बताकर बड़ा काम किया है। लोकतंत्र को मजबूत किया है। इसने उत्तर प्रदेश में ऊँची जातियों की प्रधानता को सफलतापूर्वक चुनौती प्रदान किया है। अगर आप देखें - पंडित गोविन्द वल्लभ पंत से लेकर नारायण दत्त तिवारीश्रीपति मिश्राबहुगुणावी.पी. सिंहवीर बहादुर सिंह - सभी ऊँची जातियों के मुख्यमंत्री रहे हैं। बसपा के आगमन के बाद यह पदानुक्रम ढांचाजो कि ऊँची जातियों के पक्ष में थाटूटा है। इस प्रकारबसपा ने वास्तविक रूप से दबे-कुचले-वंचित समाज के लोगों को आवाज प्रदान कर उन्हें सशक्त करने का काम किया है। दूसराइसने भारतीय राजनीतिक व्यवस्था से वंचित लोगों को मुख्यधारा में लाने का काम किया है। तीसराइसने वास्तव में ऊँची जातियों के प्रधानता को चुनौती प्रस्तुत किया है।

 संजीव कुमार, सहायक प्राध्यापक, श्यामा प्रसाद मुखर्जी महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय।

 नेहा सिंह, शोधार्थी, सेन्टर फॉर स्टडी ऑफ डिस्क्रीमिनेशन एण्ड एक्सक्लूजन, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली।

 रौशन कुमार शर्मा, शोधार्थी, राजनीति विज्ञान विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय।

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