सबका साथ-सबका विकास देश के सबसे प्रभावी नारों में से एक है......

                                                           प्रोफेसर श्रीप्रकाश सिंह

 

 

 

चुनाव उत्तर प्रदेश में समाप्त होने को हैं। ऐसे में पूर्वांचल की राजनीति का खासा महत्व है। हिन्दुत्व की राजनीति, योगी आदित्यनाथ, संगीत सोम सहित पूर्वांचल की राजनीति पर हमारे साथ बातचीत करने के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग से प्रोफेसर श्रीप्रकाश सिंह  हैं। इस बातचीत को समन्वय कर रहे हैं पंकज कुमार झाअरुण कुमार सिंह और देवारती रॉय चौधरी| 

PKJ- आप खुद उत्तर प्रदेश की ज़मीन से आते हैं और वहां कि राजनैतिक फ़िज़ा में हम देखते हैं  की हर क्षण कई परिवर्तन हो  रहे हैं  आज ही क्यूँ पिछले 50 वर्षों में उत्तर प्रदेश की राजनीति में आए परिवर्तन को आप कैसे आंकते हैं? इस सन्दर्भ में लोकतांत्रिक राजनैतिक  में आये बदलावों को एक विश्लेषक के नज़रिए से आप कैसे परिभाषित करते  हैं ?

SPS-उत्तर प्रदेश की राजनीति में बदलाव और विकास सब क्षेत्रीय रहा है, कोई सर्वांगीण विकास उत्तर प्रदेश के किसी भी राजनैतिक दल ने नही किया हैं इसी नाते आज भी लोग कल्याण सिंह सरकार के गवर्नेंस और उनके विकास नीति को याद करते हैं। उदाहरण के तौर पर मायावती जी जब सत्ता में आई तो नोएडा (Noida), ग्रेटर नोएडा का विकास हुआ एक पूंजीपति का विकास हुआ किसी और का नही हुआ, जब मुलायम सिंह जी की सरकार बनी तो उन्होंने इटावा क्षेत्र का और अपने गृह जनपद का विकास किया किसी और का विकास नहीं किया उनके नाम पर भी एक हाईवे इसके अतिरिक्त और कुछ नही, इसके अलावा आप सोच कर के देखे उत्तर प्रदेश की राजनीति में विकास कहाँ हुआ, मैं सुल्तानपुर जिले से आता हूँ आप सोच कर के देखें सुल्तानपुर का ही एक भाग अमेठी कुछ विकसित नज़र आता हैं, गाँव की हालत वहां भी बदतर है लेकिन सुक्तानपुर जिले के बहुतायत हिस्से में अभी कुछ नही पहुंचा, शिक्षा संस्थान के नाम पर  केवल  एक केएनआई( KNI) ही है, एक गन्ना की मिल है, इसके अलावा कोई नया उपक्रम, कोई नया विद्यालय नही बना। जब तक आप समाज को शिक्षा संस्थाए नहीं देते, रोजगार के अवसर नहीं देते, सड़क, बिजली और पानी की व्यवस्था नही करते तो आप के सारे विकास के संसाधन एक जगह पर आकर केन्द्रित हो जाने से पूरे राज्य का कही से विकास नहीं होता| दुर्भाग्य से विकास विकास विकास कहा तो जाता है मगर यह विकास तीन क्षेत्रों तक सीमित हो गया है एक अमेठी दूसरा नोएडा, ग्रेटर नोएडा तीसरा मुलायम सिंह जी का गृह जनपद इसके अलावा उत्तर प्रदेश में विकास कहीं नज़र नही आता|

PKJ- हाल में ही नरेन्द्र मोदी सरकार के  द्वारा जो नोटबंदी सम्बंधित  फैसले हुए, अभी बिलकुल चुनाव नज़दीक आ रहे हैं उस सन्दर्भ में आप को क्या लगता है एक राजनैतिक शास्त्री होने के नजरिये से इस तरह के फैसलों का नेताओं, पार्टियों और विशेष रूप से गरीब जनता पर क्या प्रभाव पड़ने वाला है?

SPS- नरेन्द्र मोदी को लोग आंकने में बहुत भूल कर रहे हैं मैं यह बात इस नाते कह रहा हूँ की मोदी एक ऐसे प्रधानमंत्री साबित हो रहे हैं जो जनता की रसोई तक पहुँच रहे हैं, जनता के चाहरदीवारी के बीच पहुँच रहे हैं सिर्फ एक ही नीति नहीं उनकी अन्य नीतियों का भी आप जिक्र करें तो आपको मिलेगा की उन्होंने खाता खुलवाया तो गरीब के चाहरदीवारी तक पहुंचे, उन्होंने सबके घरों में सब्सिडी के द्वारा गैस कनेक्शन भिजवाया तो उसकी रसोई तक पहुंचे और जब उन्होंने नोट बंदी की तो प्रत्येक व्यक्ति के जेब तक पहुंचे और प्रत्येक व्यक्ति में ख़ासकर तो गरीब तबका जो अपने पास जो छोटी मोटी पूंजी थी उसका महत्त्व महसूस हुआ, पहली बार उसे लगा की उसके छोटी पूंजी का भी महत्त्व है। पहली बार उसे लगा की एक ऐसी सरकार आई है जो पूंजीपतियों पर प्रहार कर रही है, उसको लगा अब ये हमारे बराबर आ गए तो नोटबंदी के माध्यम से, स्वछता अभियान के माध्यम से, गैस सिलिंडर के माध्यम से और प्रत्येक परिवार में एक अकाउंट अवश्य खुले, जनधन खुले इसके माध्यम से मोदी वहां तक पहुचे जहाँ तक नेहरु के बाद कोई प्रधानमंत्री नही पंहुचा था। एक बात और राजनीति का जो डिस्कोर्स है वो एक दिन में नहीं बदलता आप स्वयं सोचिये गरीब आदमी बैंकों की तरफ देखता नही था आज जनधन के माध्यम से वो बैंक जाता है पैसा जमा करता हैं और उपयोग करता है जब आप सर्जिकल स्ट्राइक करते हैं पड़ोसी दुश्मन राष्ट्र पर तो गाँव का गरीब किसान का बेटा भी उतना ही गौरवान्वित महसूस करता  है, जितना कि किसी राजनैतिक दल का नेता, तो जो डिस्कोर्स और कैनवास मोदी जी ने खड़ा किया है उस कैनवास पर गर दल के सदस्य बीजेपी के सदस्य अच्छी पेंटिंग बना सके जनता को दिखा सके तो मोदी आज की तारीख में अपने प्रतिद्वंदियों से बहुत आगे नज़र आते हैं|

PKJ- उत्तर प्रदेश का चुनाव आते ही अधिकांश  विश्लेषक, सर्वे  रिपोर्ताज सबमें  SC, ओबीसी और मुस्लिम जनसंख्या उसके विशेष दल के प्रति झुकाव की अटकले शुरू हो जाती हैं, ऐसे में शेष बचे एक अपर कास्ट का भी महत्त्व  है और उसके भी बीस फीसदी वोट इस चुनाव में हैं ऐसे में आपके अनुसार इन अपर कास्ट के वोटिंग व्यवहार में आने वाले चुनाव  में आप कैसे आंकते हैं ?

SPS- बहुत ही स्पष्ट सी समझ है हमारी, समाज का जो संभ्रांत तबका है जिसको हम अपर कास्ट कह रहे हैं ये सर्वाधिक पढ़ा लिखा तबका है और सर्वाधिक आलसी तबका भी है, पढ़ा लिखा है विश्लेषण करता हैं और समझ रखता है लेकिन चुनाव में वोट देने नहीं जाता है तो आपके माध्यम से एक अपील वोट देने जरूर जाएं दूसरी बात उत्तर प्रदेश की राजनीति से  जाति जाती नहीं तो  इस नाते कोई सफल सुदृढ़ स्वच्छ व्यवस्था आती भी नही। बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर ने बहुत स्पष्ट कहा था की जाति का स्वरुप सदैव सांप्रदायिक होता है और यह बात तो उत्तर प्रदेश और बिहार के सन्दर्भ में लागू होती है की वहां जाति का स्वरुप सांप्रदायिक है। अपर कॉस्ट के लोग सामान्यतः वर्त्तमान परिदृश्य में भारतीय जनता पार्टी की तरफ झुकाव रखते है लेकिन विश्लेषण करने की यह बात है की कांग्रेस भी ब्राह्मण समुदाय को अपना प्रमुख आधार मानती रही है। मायावती जी के वर्तमान राजनीति में ब्राह्मण समुदाय एक बड़ा रोल निभाता नजर आ रहा है। अब वह ब्राह्मण समुदाय मायावती के साथ जायेगा या कांग्रेस के साथ जायेगा या भाजपा की तरफ रहेगा यह विश्लेषण का विषय है। क्षत्रिय समाज सामान्यतः तो प्रमुख दलों की तरफ उन्मुख होता रहा है एक समाजवादी पार्टी और दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी लेकिन जिस तरह से समाजवादी पार्टी में क्षत्रिय नेताओं के साथ अमर सिंह, ओमप्रकाश सिंह के साथ जो व्यवहार हुआ है उसको देखते हुए बहुत संभावाना है की क्षत्रिय मतदाता राजनाथ सिंह के साथ रहने वाला है। जो अन्य वर्ग है जैसे कायस्थ इसकी एक सामाजिक प्रवृत्ति है सदैव सत्ता के साथ चलता है तो जिसकी संभावना दिखेगी वह वर्ग उसके साथ चला जायेगा वैसे भी आज के परिदृश्य में हम विश्लेषण करें तो भारतीय जनता पार्टी गैर जाटव वोटर को, यादवों को छोड़कर जो अदर बैकवर्ड वोटर और अपर कास्ट के माध्यम से सत्ता के तरफ देख रही है।

PKJ - भाजपा जब सबका साथ सबका विकास का नारा देती है तो निश्चित तौर पर इसका अर्थ बहुत गहरा है जो एक समतामूलक समाज की स्थापना के दावों को पक्का करती है। परंतु हम उसके साथ-साथ यह भी देखते हैं कि उत्तर प्रदेश में कई क्षेत्रीय क्षत्रप मसलन महंत योगी आदित्यनाथ हो या फिर संगीत सोम जब विवादास्पद बयानबाजी करते हैं जो भाजपा के उस मूल दावे को चुनौती मिलती नज़र आती है। आपका विचार जानना चाहूँगा?

SPS - बीजेपी का सबका साथ सबका विकास का नारा इंदिरा के गरीबी हटाओं के बाद सबसे प्रभावी नारों में से एक रहा है। स्वतंत्र भारत में किसी एक नारे ने देश के नागरिकों को प्रभावित किया था तो वह था जय जवान जय किसान। दूसरा नारा इंदिरा गाँधी ने गरीबी हटाओं का दिया, जो मेरे हिसाब से वास्तविकता में सफल नहीं रहा। इसी दिशा में तीसरा महत्वपूर्ण नारा नरेन्द्र मोदी जी के द्वारा सबका साथ-सबका विकास का दिया गया है। जहाँ तक पार्टी का सवाल है यह जरुरी नहीं है कि पार्टी अपने मूलभूत मुद्दों को भूल जाए। इसलिए यह जरुरी है कि कोई भी पार्टी  केवल अपने तात्कालिक परिस्थितियों व नये वोटर के अनुसार ही राजनीति नहीं करें। अगर वह ऐसा करती है तो कभी सफल नहीं होगी। योगी आदित्य नाथ हो या संगीत सोम अगर वे वैचारिक आधार को वापस लाते हैं तो उसके पीछे उनके पुराने समर्थक वोटों को भी जोड़ने की मंशा होती है। इस लिहाज से हिन्दुत्व के मुद्दे हो, राम मंदिर का मुद्दा हो, धारा 370 हो या फिर कश्मीर को कैराना से जोड़ने की कोशिश को इस संदर्भ में देखा जा सकता है, जो कि एकदम गलत नहीं है। उत्तर प्रदेश का तो इतिहास ही कुछ ऐसा है First terrorize than sympathize। आप स्वयं यह सोचकर देखें कि मुजफ्फरनगर के दंगों में जो हिन्दू प्रभावित हुए उनकी आर्थिक दशा में क्या परिवर्तन आया है और जो मुस्लिम परिवार दंगे में प्रभावित हुए हैं उनकी आर्थिक स्थिति कैसी हैं। आप यह देखकर हैरत में रह जायेंगे कि गरीब मुस्लिम परिवारों के 2-3 मंजिले घर बन गये जबकि हिन्दू परिवार की स्थिति वैसी की वैसी ही है। यह सब सरकारी नीतियों के कारण होता है। वैसे में जो दल सत्ता में आने की कोशिश करता है वह भी उसी मानकों का प्रयोग करने लगता है।

PKJ - जब भाजपा ने अपने घोषणा पत्र जारी किया उसमें एक तरफ जहाँ राममंदिर के प्रति फिर से झुकाव व्यक्त किया गया है। वहीं दूसरी तरफ गुड-गवर्नेंस के प्रति भी एक वचनबद्धता दिखाई पड़ती है। इसे आप कैसे देखते हैं, यह विरोधाभास के रुप में है या इसे एक साथ लेकर चलने की प्रवृति है।

SPS- देखिये बहुत स्पष्ट रुप से यह बताना चाहता हूँ कि व्यक्ति की धार्मिकता, समाज की धार्मिकता विकास की विरोधी नहीं होती है। हम मंदिर जाते हैं तो उतनी ही दक्षता से गजेट्स का प्रयोग करते हैं। इस प्रकार पहली बात कि धार्मिकता, धर्म व मंदिर का विकास के मसलों के साथ कोई भी विवाद व गतिरोध नहीं है। दूसरी बात, जहाँ तक भाजपा का सवाल है, भाजपा ने राम-मंदिर को लेकर स्पष्टता दिखाई है। पार्टी के अनुसार वे न्यायायल की निर्णय के अनुसार यानि संवैधानिक प्रतिबद्धता को दोहराती है। यदि कोई सेटलमेंट होता है तो भी वह न्यायालय की देखरेख में होगा। सेंटलमेंट सदैव संस्थाओं व व्यक्तियों के बीच में होता है। न्यायपालिका समाज के हितों को ध्यान में रखते हुए पूरे प्रक्रिया को मोनिटर करती है। मुझे लगता है कि वह (न्यायपालिका) सर्वाधिक उपयोगी व वर्तमान  समय का सबसे प्रासंगिक विचार है।

PKJ - आप पूर्वांचल स्थित सुल्तानपुर से आते हैं, जब आप वहाँ होंगे निश्चित तौर पर आपकी बहुत सारी स्मृतियाँ होगीं समाज को लेकर, व्यवस्था को लेकर राजनीति को लेकर। जब आप वहाँ से निकलकर आते हैं और एक आउट-साईडर लैंस से जब आप देखते हैं।

SPS-  मेरी 12वीं तक की पढ़ाई लिखाई सुल्तनापुर में हुई है। आज जब में वहाँ जाता हूँ तो देखता हूँ कि विकास के मापक वहाँ किस प्रकार के हैं। परंतु मुझे यह देखकर बहुत दुख होता है कि विकास कुछ नहीं हुआ है। पहले यह मान्यता थी कि रेलवे से सटा कस्बा विकसित होता था। परंतु आप यूपी के कस्बों, बाजारों का निरीक्षण कर लें आपको दिख जायेगा कि जो 20 साल पहले कस्बे थे वह उसी रुप में हैं, सड़को का बुरा हाल है, जनसंख्या बढ़ती जा रही है उसके हिसाब से आधारभूत सुविधाएँ नहीं है। इसलिए मुझे लगता है कि जो भी सरकार सत्ता में आती है उसके पास अपना ब्लू प्रिंट होना चाहिए, और उसपर अमल करके भी दिखाना चाहिए। पूर्वी यूपी में ना तो विश्वविद्यालय खुला है और ना ही फैक्ट्री खुली है। पूर्वी उत्तर प्रदेश जहाँ से मैं आता हूँ वहाँ की स्थिति बहुत ही भयावह है। जहाँ तक डेमोग्राफिक कंपोनेंट की बात है, लोग अब कस्बों की ओर जाना चाहते हैं। छोटे-छोटे कस्बों की ज़मीन बहुत महंगी हो गई है, जब सुविधाओं के नज़रिये से उसका विश्लेषण करें तो हम पाते हैं कि 30 साल पहले की जो स्थिति थी वह आज भी है।

आपके माध्यम से मैं यह बताना चाहता हूँ कि सुल्तानपुर कचहरी रोड जो कि शहर में सबसे महत्वपूर्ण इलाका है वहाँ जाकर देखें कि कितनी गंदगी का अंबार लगा हुआ है। कितनी अस्त-व्यस्तता है। वहाँ इतनी भीड़ नज़र आती है जितनी आप चाँदनी चौक के इलाके में देखेंगे। इसलिए इन इलाकों का विस्तार जिस तरह से हुआ है उसकी देखरेख उस तरह से नहीं हुई। इन इलाकों में टाउनशिप, कस्बा, विद्यालय आदि खोले जाने चाहिए।

PKJ - हमसे हिन्दुत्ववादी राजनीति सहित अन्य मुद्दे पर बातचीत करने के लिए आपका विशेष आभार

SPS- धन्यवाद और बहुत बहुत धन्यवाद टीम IESAI को।

 

 प्रोफेसर श्रीप्रकाश सिंह  दिल्ली विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग में प्रोफेसर है.

 पंकज कुमार झा  दिल्ली विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान विभाग से पीएचडी हैं। IESAI टीम से जुड़े हुए हैं।

 अरुण कुमार सिंह दिल्ली विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान विभाग से पीएचडी कर रहे है|  IESAI की कोर टीम के सदस्य हैं।

 देवारती रॉय चौधरी  दिल्ली विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान विभाग से पीएचडी कर रही है|  IESAI की कोर टीम की सदस्या हैं।

 

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