गन्ना किसानों की सुध किसी दल को नहीं ..........

                                    पंकज कुमार झा

                                                      संजीव कुमार

                                                      अरुण कुमार सिंह

 

उत्तर प्रदेश में एक अवधी कहावत है “माघ का जाड़ा, जेठ की धूप, बड़े कष्ट से उपजे ऊँख(गन्ना)”। यह कहावत गन्ने की खेती में रत किसानों के सामने आने वाली कठिनाइयों को सजीवता से प्रस्तुत करता है। यह ऐसी कठिनाईयाँ है जिसको केवल हाशिये पर बैठा किसान व मजदूर ही समझ सकता है, सियासतदार नहीं। बहरहाल चुनाव आते ही हमारे सियासतदारों को गन्ना किसानों के सुध होने लगती है। दिल्ली व लखनऊ में बैठी सरकार किसानों के लिए रेवड़ियाँ बाँटने का आदेश दे देती है। बहरहाल IESAI टीम ने उत्तर प्रदेश के चुनावों के माध्यम से गन्ना किसानों व किसानों की वास्तविक स्थितियों को प्रस्तुत करने की ठोस कोशिश की है। इस सिलसिले में हम पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मेरठ, मुजफ्फनगर होते हुए सरदना विधान सभा स्थित रांध्रना गाँव में पहुँचे।

जब चुनाव आता है तो किसानो को कर्जा माफ़ी का झुनझुना थमा दिया जाता है

गाँव में गन्ना की किसानी करने वाले 40 वर्षीय रामपाल की बावत गन्ना किसान कहाँ हैं हमारे नेताओं की नज़र में। हमारी पार्टी व लीडर केवल पॉलिसी बनाते हैं, परंतु वह किसके लिए बनाते हैं जब हमलोग अभाव ग्रस्त हैं। केवल जब चुनाव आता है तो किसानों को कर्ज़ा माफी का झुनझुना थमा दिया जाता है। रामपाल की बातें काफी गहरी थी जो प्रदेश में गन्ना किसानों पर हो रहे राजनीति का कच्चा चिट्ठा खोल रहा था। निश्चित तौर पर उत्तर प्रदेश की लगभग 30 लोकसभा और 90 विधानसभा सीटों पर गन्ना किसान हार या जीत तय करते है| आमतौर पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट राजनीति को किसानों की राजनीति का पर्याय माना जाता है। किसानों की राजनीति को कभी नेतृत्व प्रदान करके चौधरी चरण सिंह ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट व मुसलमान को एक साथ लाने की कोशिश की थी। लेकिन 2013 में हुए मुज़फ्फरनगर,केराना के दंगे ने किसान की पहचान को निर्वस्त्र कर हिन्दू और मुसलमान के पहचान में भुगतना पड़ा, दंगो की फसल को सियासतदारो ने खूब कटा और खामियाज़ा भुगतना पड़ा किसानो को।

पीएम सीएम दोनों ने किया है किसानों के लिए वायदा...................

गौरतलब है कि चुनाव आते ही पीएम नरेन्द्र मोदी व सीएम अखिलेश यादव दोनों ने ही किसानों के लिए वायदा किया है। प्रधानमंत्री ने अपनी रैली में गन्ना किसानों को 120 दिनों के भीतर बैंकों और चीनी मिलों के समन्वय से बकाया राशि का पूर्ण भुगतान कराये जाने की बात की है। वहीं मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने भी राज्य के किसानों के लिए अपने घोषणा पत्र में तमाम वादे कियें। किसानों को लुभाने के लिए समाजवादी पार्टी ने अपने घोषणा पत्र में कहा कि किसानों की उपज का लागत मूल्य निर्धारित करने के लिए ऐसे आयोग का गठन किया जायेगा जो हर तीन महीने में अपनी रिपोर्ट राज्य सरकार को सौपेगा। लागत मूल्यों में 50 फीसदी जोड़कर जो राशि आयेगी उस पर चुनाव जीतने के बाद आने वाली समाजवादी सरकार न्युनतम समर्थन मूल्य निर्धारित करेगी तथा सरकार सीधे किसानों से इस मूल्य पर खरीद सुनिश्चित करेगी। 

स्त्रोत-टीम- IESAI

दावों की हकीकत

चुनाव आते ही राजनैतिक दलों को फिर से गन्ना किसानों की याद आती है और सियासी जुमलों में  गन्ना किसानों के बकाया भुगतान और गन्ना के मूल्य का मसला पुरजोर तरीके से दिखने लगता है परंतु चुनाव बीतते ही इन वादों का स्मृति विलोपन हो जाता है। ऐसे में आइये एक नज़र दौड़ाते हैं कि विभिन्न पार्टियों ने इस मसले पर क्या दावे किये है और इन दावों की हकीकत क्या है?

किसान की आय दोगुनी करनी का सब्जबाग दिखाया जा रहा है लेकिन इसको हासिल करने का तरीका क्या हो ये सवाल भविष्य के गर्भ में छुपा हुआ है? सबसे बड़ी बात किसानों के फ़सलों का लाभकारी मूल्य क्या हो इस पर कोई चर्चा नही हुई

 

समाजशास्त्र में गन्ना का मुद्ददा –

शाहिद अमिन, डोनाल्ड ऐतवुद, संजय बारू, हरीश दामोदरन इत्यादि लोगों ने गन्ना उद्योग से जुड़े अलग अलग पहलू पर अकादमिक कार्य किया है |

दामोदरन व सिंह ने ईपीडब्लू में लिखे अपने लेख ‘Sugar Industry in Uttar Pradesh: Rise, Decline and Revivalमें उत्तर प्रदेश में चीनी उद्यो के विकास को विश्लेषित किया है। स्वतंत्रता पूर्व युग में 1874 का हवाला देते हुए वे कहते हैं कि अंग्रेज मैनेजिंग कंपनी की  स्थापना कानपुर में हुई, गोरखपुर व बस्ती से गन्ना खरीदकर इस कंपनी द्वारा गुड़ बनाया जाता था। यह पूर्वी क्षेत्र  है जहाँ चीनी मिलों का उभार देखा गया। शाहीद अमीन ने अपनी किताब “Sugarcane and Sugar in Gorakhpur: An inquiry into Peasant Production for capitalist Enterprise in Colonial India” में इस बात की पड़ताल करते हैं कि उत्तर प्रदेश के पूर्वी क्षेत्र में आखिर क्यों चीनी मिलों का विस्तार हुआ। उन्होंने पाया कि पूर्वी यूपी में नये चीनी मालिकों को जमींदार-साहूकार-बिचौलिया रुपी संस्थागत तंत्र का जबदरदस्त समर्थन मिला। जबकि पश्चिमी यूपी में इस तरह की स्थिति का अभाव था। पश्चिमी यूपी में गन्ना का मूल्य काफी अधिक था। उत्तर स्वतंत्र भारत में 1990 तक की स्थिति को देखें तो स्पष्ट है कि महाराष्ट्र ने चीनी उत्पादन में उत्तर प्रदेश को पछाड़ा। उसका प्रमुख कारण यह था कि भारत सरकार द्वारा चीनी मिलों को कॉपरेटिव सेक्टर के अंतर्गत डाल दिया गया। बावजूद गन्ना उत्पादन में अभी भी यूपी नंबर 1 की  स्थिति पर था। तीसरा चरण 1990  से अब तक का है। इसमें धीरे-धीरे चीनी उद्योग का एक बार फिर से पुनरुथान उत्तर प्रदेश में देखा जा सकता है। 2004 में तात्कालिन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव द्वारा यूपी में सुगर इंड्रस्ट्री प्रमोशन पॉलिसी की शुरुआत की गई, जिसके माध्यम से घरेलू व अंतर्राष्ट्रीय परिवेश में चीनी मिलों के प्रोत्साहन की नीति अपनाई गई।

विकास की राजनीति में हाशिये पर गुड़ और खांडसारी उद्योग

सारी पार्टियाँ आज  विकास की राजनीति को अपने एजेंडा में शुमार करने के लिए एक मत हैं।

ऐसे समय जब स्किल इंडिया, मेक इन इंडिया,  स्टार्टअप और SME की बात हो रही है तो देखना होगा की परंपरागत गन्ना प्रसंस्करण क्षेत्र अपने आप को इस प्रतिस्पर्धा में खड़ा पाते है।

एक तरफ आधुनिक चीनी उद्योग है वहीं दूसरी तरफ परंपरागत गुड़ और खांडसारी लघु उद्योग है। चीनी उद्योग को संगठित क्षेत्र का दर्जा  और संरक्षण 1935 से ही  ब्रिटिश भारत सरकार ने दिया था और इस उद्योग को आज़ादी के बाद उत्तर औपिनिवेशिक भारत सरकार ने जारी रखा। सन् 1955 में चीनी को आवश्यक वस्तु अधिनियम (Essential commodity Act, 1955) के तहत सम्मिलित किया गया वहीं दूसरी तरफ असंगठित क्षेत्र के गुर और खांड उद्योग को उनके रहमोकरम पर छोड़ दिया गया है| ऐसे कहावत है  “गुरु गुड़ और चेला चीनी” यानी गुड़ को ‘निम्न” और चीनी को “उच्च” कोटि का दर्जा हमने कहावतों के जरिये सामान्यीकरण कर दिया है, ऐसे में सवाल बनता है क्या आधुनिक चीनी उद्योग से निर्मित सफ़ेद क्रिस्टल शक्कर यानी चीनी हमारे सेहत के लिहाज़ से ठीक है या नही ? गौरतलब है कि इस उद्योग को हमारी टीम ने बहुत सूक्ष्मता से जाँचने की कोशिश है। इसे इस लिंक पर भी देखा जा सकता है।

 

http://iesai.in/archive/regional/316-politics-of-sugarcane-issues-related-to-smes.html

 

 

 

 

 

 

 

 

मालिक भाजपा की तरफ तो मजदूर पर बसपा का रंग

अपने शोध में हमने गुड़ लघु उद्योग में जब लोगों से यह जानना चाहा कि वह इस बार किसे वोट डालेंगे तो उद्योग चलाने वाले शंकर त्यागी ने ब़ड़े मुखर अंदाज़ में कहा- यहाँ तो बीजेपी की चलती है। यह संगीत सोम का इलाका है। हमलोग उन्हीं को वोट डालते हैं। मालिक के सामने जब हमने उद्योग में कार्य कर रही एक दलित महिला कुसुम देवी ने कहा कि हमें कम मजदूरी मिलती है लंबा परिवार है हमारा। जब हमने पूछा कि आप अपना वोट किधर देंगी तो बहुत उत्साह से कुसुम देवी ने कहा  मायावती ने हमारे समाज के लिए बेहतर काम किया है। गुंडा-गर्दी भी कम किया है।

बहरहाल चुनाव,राजनीति व लोकतांत्रिक विमर्श के बीच भी जीवन की समस्याओं के साथ व्यवस्था के प्रति के आस भी बची है। और वही आस लोगों को और मतदान करने के लिए प्रेरित करती है। समय की मांग है कि हमारे नुमाइंदे राजनीति के बजाय विकास की रौशनी भी जलायें। अन्यथा किसान आंदोलन की ज़मीन से विरोध व वैमनस्य के सुर कभी भी उठ सकते हैं।

 

संदर्भ सूची

आशुतोष वार्ष्णेय(१९९५) डेमोक्रेसी डेवलपमेंट एंड दी कंट्रीसाइड; अर्बन-रूरल स्ट्रगल इन इंडिया, कैंब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस

 Amin, Shahid, Sugarcane and Sugar in Gorakhpur: An inquiry into peasant production for capitalist enterprise in colonial India’ (Delhi: Oxford University Press, 1984.)

Attwood, D.W, ‘Raising cane: The political economy of sugar in western India’ (New Delhi: Oxford University Press, 1992.)

Baru, Sanjaya, ‘The Political Economy of Indian Sugar: State Intervention and Structural Change’ (Delhi : Oxford University Press, 1990.)

Baru, Sanjay, ‘Sugar Crisis: Who Bears the Burden?’ Economic & Political weekly, 15(27), (July, 1980), pp.1152-1156

Damodar, H., & Singh, H., ‘Sugar Industry in Uttar Pradesh: Rise, Decline and Revival’, Economic and Political Weekly, 42 (39),(2007), pp.3952-3957

 

 

 

 

 

 

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