डॉ. पंकज कुमार झा

उत्तर प्रदेश के चुनाव के सात चरणों की समाप्ति के बाद परिणाम देखने की बेताबी सब में हैं। लेकिन परिणाम कुछ भी हो, लोकतांत्रिक राजनीति व उसके विमर्श में कुछ मुद्दे हमेशा प्रासंगिक व चिरकालिक बने रहेंगे। विकास के केन्द्र बनाम राज्य के मॉडल, मुस्लिम वोट बैंक की राजनीति, आएसएस की समरसता अभियान आदि मुद्दों पर हमारे से बातचीत कर रहे हैं दिल्ली विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान विभाग के प्रोफेसर संगीत कुमार रागी। इस बातचीत को समन्वित कर रहे हैं, डॉ. पंकज कुमार झा और अंकित कुमार

 

PKJ एक राजनीतिशास्त्री के रुप में उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति को आप कैसे देखते हैं?

SKR उत्तर प्रदेश का चुनाव काफी महत्वपूर्ण है, यह सबसे बड़ा प्रदेश है, यह सबसे अधिक सांसदों को चुनकर लोकसभा में भेजता है। यदि कोई दल केन्द्र में सत्ता में बने रहना चाहता है तो वह चाहेगा कि यूपी में उसकी स्थिति मजबूत बनी रहे। केन्द्र में सरकार बनाने का रास्ता यूपी होकर ही जाता है। ऐसे में 2019 में जब लोकसभा के चुनाव होगें तो उस समय यह महत्वपूर्ण होगा कि यूपी में किसकी सत्ता है। यह चुनाव कांग्रेस के लिए महत्वपूर्ण तो है ही भाजपा के लिए विशेष रुप से महत्वपूर्ण है। 2014 के लोकसभा चुनाव में मिली अपार सफलता के बाद भाजपा ने विधान सभा के हुए चुनावों में अच्छा प्रदर्शन  किया है। निश्चित तौर पर वह बिहार व दिल्ली में पराजित  भी हुई। ऐसे में भाजपा के लिए यूपी में एक बार फिर अच्छा प्रदर्शन करने की चाहत होगी ताकि वह 2014 में यूपी में अपने प्रदर्शन को दोहराये। कांग्रेस जिस गठबंधन के साथ इस बार यूपी में उतरी है वह चाहेगी कि उसका साथ बना रहे, ताकि 2019 के चुनाव के पहले उसके पास गठबंधन का एक विकल्प हो।

 

PKJ-क्या उत्तर प्रदेश इस बार जाति-धर्म की राजनीति से आगे निकल पायेगा।

SKR- उत्तर प्रदेश में जो चुनावी माहौल है उसके संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट के हाल के बयान को देखना होगा जिसमें उसने राजनीतिक दलों से चुनाव में धर्म-राजनीति का प्रयोग नहीं करने की बात की है। लेकिन देखना यह दिलचस्प होगा कि किस हद तक इसको फैलो किया जायेगा। यह मुश्किल प्रतीत होता है क्योंकि इसके बीच की रेखाएँ बहुत ही संकरी व कमजोर हैं। हाल ही में मायावती ने अपनी रैली में कहा कि बीजेपी अल्पसंख्यकों के खिलाफ है, क्या वे ऐसा करके धार्मिक बातचीत नहीं कर रही हैं। तो निश्चित तौर पर सभी दल चुनाव में जीतने के लिए धर्म-मजहब को एक हथियार के रुप में प्रयोग करेगी। जब जीत महत्वपूर्ण मुद्दा बन जाता है मुझे लगता है कि जाति-राजनीति सब यूपी के चुनाव में चलेंगी। यह सारी पार्टियाँ कर रही है। जब आप उम्मीदवार का स्वरुप देखें और सोशल मीडिया में उन पर होने वाली प्रतिक्रियाओं को देखें तो ज्यादा बताने की जरुरत नहीं है। यह कोई रोकेट साईंस भी नहीं है। यह साफ-साफ दिखता है कि जातीय-समीकरण को ध्यान में रखकर जो अंकगणित बैठता है सभी पार्टियाँ उसका प्रयोग करती हैं।

 

PKJ. एक प्रसिद्ध अंग्रेजी अखबार ने उत्तर प्रदेश की राजनीति को दो विकास मॉडलों के बीच प्रतिस्पर्धा करार दिया है। वो मॉडल मोदी बनाम अखिलेश मॉडल है। आप इससे कितना सहमत है? क्या इस बार विकास के नाम पर उत्तर प्रदेश में वोट मांगा जायेगा।

SKR मुझे नहीं लगता है कि यह दो प्रकार के विकास मॉडलों के बीच एक प्रतिस्पर्धा है। क्या आपको ऐसा लगता है कि समाजवादी पार्टी विकास के नाम पर वोट मांग रही हैं। बीएसपी विकास के नाम पर वोट मांग रही है। जब बिहार में चुनाव हुआ था तब भी मीडिया व अकादमिक जगत के लोगों ने यह कहा था कि यह दो प्रकार के विकास मॉडल के बीच एक प्रतिस्पर्धा है। जबकि हम सब जानते हैं कि किस तरह से जातिय गठजोड़ ने इस जीत को आसान बनाया। आज यह प्रचलन बढ़ गया है कि हम सब गुजरात के स्थापित विकास मॉडल से अन्य राज्यों की तुलना करने में लग गये  हैं। जबकि वास्तविकता है कि यूपी और गुजरात में ज़मीन आसमान का अंतर है। गुजरात में सड़क-बिजली-पानी, मेडिकल सुविधाएँ, शिक्षा में ईनरोल्मेंट के आँकड़े जो दिखते हैं उसकी तुलना में यूपी कहीं नहीं है। इसलिए मैं इसे कहीं से भी दो विकासवादी मॉडल के बीच की प्रतिस्पर्धा नहीं मानता, बल्कि इसके स्थान पर मैं यह शुद्ध जातिय गणित के आधार पर थोथे विकास की उत्तर प्रदेश की छवि प्रस्तुत करने की मुहिम के रुप में देखता हूँ.

PKJ  मुस्लिम वोट बैंक की राजनीति पर आपकी क्या प्रतिक्रियाएँ हैं?

SKR बहुत मज़ेदार बात है कि इस देश में यदि हिन्दुओं की बात की जाती है कि हम इसे हिन्दू धुव्रीकरण का नाम देते हैं वहाँ सांप्रदायिकता का चोला पहना देते हैं। वहीं जब हम मुस्लिम वोट बैंक की बात करते हैं तो अल्पसंख्यकों की बात होती है, तो वह भी तो एक प्रकार की धार्मिक उन्माद है। जब हम कहते हैं कि हिन्दुओं को विशेष दल के पक्ष में वोट करना चाहिए तब तो हम उसे सांप्रदायिक करार देते हैं। परंतु जब मुस्लिम, दलित, जाति धर्म के नाम पर धुव्रीकरण करते हैं तो उसे धर्मनिरपेक्षता का नाम दे दिया जाता है। यह ढोंग और पाखंड है जो जनता जानती है, उसमें सेकुलरिज्म या धर्मनिरपेक्षता जैसी कोई चीज नहीं है। जहाँ तक मुस्लिम मतों का सवाल है एक बात तो तय है कि वह बीजेपी को वोट नहीं करती है। कुछेक फीसदी वोट जरुर भाजपा की तरफ जा सकते हैं। हमने वाजपेई जी के समय भी हालांकि देखा था कि मुस्लिम आबादी ने उन्हें समर्थन किया था। परंतु कुल जमा मुस्लिम मतों का झुकाव भाजपा की तरफ नहीं रहा है। ऐसे में यूपी में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि मुस्लिम मतदाता किस तरफ जाते हैं। समाजवादी पार्टी जिसके कार्यकाल में सबसे अधिक दंगे हुए। सपा ने जानबूझकर मुस्लिमों के खिलाफ दंगे करवाये, ताकि एक तरफ तो उनकी पिटाई हो दूसरी तरफ उन्हें सहायता पहुँचाई जा सके। इसी तरह बसपा भी मुस्लिमों को अपनी ओर जोड़ने के लिए बहुत कोशिश कर रही है। ऐसे में देखना यह दिलचस्प होगा कि मुस्लिम मतों का झुकाव किस तरफ जाता है।

PKJ राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ द्वारा शुरु किया गया समरसता अभियान क्या दलित वोटरों के भाजपा की तरफ खींचने में सफल होगा। क्या इसे चुनाव से पूर्व दलितों को जोड़ने की मुहिम के रुप में देखा जा सकता है?

SKR ऐसा वे लोग कहते हैं जिनकी आरएसएस के बारे में कोई समझ नहीं है। वो दरअसल सीजनल बर्ड हैं जो आरएसएस को मौका आने पर देखने लगते हैं, फिर कुछ कुछ पढ़ने लगते हैं और फिर तुरंत विशेषज्ञ बन जाते हैं। आरएसएस का समरसता अभियान आज से नहीं बल्कि पिछले साठ वर्षों से अनवरत चलता रहा है। बहुत कम लोग जानते हैं कि सेवा भारती, कल्याण आश्रम, सेवा मंडल की करीब 132 प्रकल्प इस दिशा में काम कर रहे है। समरसता अभियान का लक्ष्य राजनीतिक रहा ही नहीं है वरन् वह हिन्दू समाज के निर्माण, उसे संगठित करने, उनमें समरसता स्थापित करने, उनकी सोच को  संगठित करने व आगामी चुनौतियों से लड़ने के लिए प्रेरित करती है। यही उसकी निष्पति है, यही उसकी प्रेरण है, यही उसका उपसंहार है।

PKJ भाजपा उत्तर प्रदेश की कुल 403 सीटों में से 83 ऐसी सीटें हैं जहाँ भाजपा पहले कभी चुनाव नहीं जीती है। ऐसे में भाजपा क्या इस 83 के चक्रव्यूह से निकलने के लिए विशेष रणनीति अपनायेगी।

SKR- मैं यह तो नहीं जानता कि बीजेपी के मन में इस विषय पर क्या चल रहा है। तथा उनके पास क्या विशेष रणनीति है इसके लिए। लेकिन जब आप इन्हीं 83 सीटों पर आप पिछले लोकसभा में भाजपा का प्रदर्शन देंखेगे तो वहाँ भाजपा ने अच्छा प्रदर्शन किया था। इसलिए यह मानना पड़ेगा कि कल तक जहाँ भाजपा ने विजय नहीं प्राप्त किया वहाँ इस बार भी नहीं जीतेगी।राजनीति का खेल अनिश्चिताओं से भरा हुआ है। मुझे लगता है कि बीजेपी के मन में यह जरुर होगा कि वह उन विधान सभाओं पर विशेष रणनीति अपनाएगी जिसमें उन्हें पिछली विधानसभा में सफलता नही मिली थी।

PKJआपका यूपी के चुनाव पर IESAI टीम के साथ बातचीत करने के लिए विशेष आभार

SKR-आपका भी धन्यवाद, आपकी टीम को विशेष शुभकामनाएँ

प्रोफेसर संगीत कुमार रागी, राजनीति विज्ञान विभाग, डीयू में प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं।

 

पंकज कुमार झा, राजनीति विज्ञान विभाग, डीयू से पीएचडी डिग्री प्राप्त हैं, IESAI टीम से जुड़े हुए हैं।

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