मोदी, इंदिरा व पॉपुलिज्म की राजनीति

                              

                                            क्रिस्टोफ़ जेफ़रलो, पंकज कुमार झा

 

 

2014 के चुनाव में मिली अपार सफलता को दोहराते हुए   नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव परिणाम ने कई चुनावी पर्यवेक्षकों का ध्यान अपनी तरफ खींचा है। विश्लेषकों-पर्यवेक्षकों के एक बड़े समूह ने मोदी की तुलना  1970 के शुरुआत में इंदिरा गाँधी की अगुवाई वाले कांग्रेस हेजोमोनी से शुरु कर दी है। ऐसे में यह लेख हमें इस सवाल पर विस्तार से सोचने विचारने का न्यौता देता है कि क्या दोनों ही नेताओं की कुछ सामान्य विशेषताओं के आधार पर उनके बीच तुलना वाजिब व प्रासंगिक है। खास तौर पर ऐसे समय में जबकि दोनों ही नेताओं का महत्वपूर्ण योगदान अपने-अपने दलों में रहा है। दोनों की शैलियों में भी समरुपता के बावजूद दोनों अलग-अलग प्रकार के लोकप्रियता से जुड़े प्रतिरुप को प्रस्तुत करते हैं।

 

 

  क्या है मोदी व इंदिरा में समानता

फोटो: गूगल

 

भारतीय राष्ट्र को एक प्रतीक के रुप में प्रयोग किया

जहाँ तक दोनों नेताओं के बीच समरुपता का सवाल है क) दोनों  नेताओं ने भारतीय राष्ट्र के साथ अपनी संगति स्थापित करने की कोशिश की। दोनों इस मामले में भारतीय राजनीति की समझ रखने वाले महारथी के रुप में जाने जाते हैं जिन्होंने अपनी समझ के बल पर एक तरफ जहाँ मतदाताओं को आकर्षित किया, वहीं दूसरी तरफ अपने नये नारों व जुमलों से पब्लिक स्पेस में अपनी मौजूदगी को पक्का किया। इंदिरा जब भारतीय राजनीति में अपने चरम पर थीं तो उन्होंने इंडिया इज़ इंदिरा, इंदिरा इज़ इंडिया, जब तक सूरज चाँद रहेगा इंदिरा तेरा नाम रहेगा, इंदिरा लाओ, देश बचाओं के नारों से राष्ट्र व देश के साथ अपनी मजबूत सहयोजन प्रस्तुत किया। इसी तरह समकालीन भारतीय राजनीति में मैं नया भारत हूँ, एक भारत-श्रेष्ठ भारत, हर-हर मोदी घर-घर मोदी जैसे नारों के साथ मोदी भी लोकप्रिय जुमलों का प्रयोग करते हुए नज़र आते हैं।

 

 संचार साधन के रुप में रेडियो का दोनों नेताओं ने किया प्रयोग.

  इस विमर्श से प्रेरित होकर दोनों नेताओं ने जनता से प्रत्यक्ष रुप से जोड़ने  के लिए संचार के साधनों का प्रयोग किया। यह एक ऐसा संपर्क था जो कि जन-बैठकों व रेडियों के द्वारा किया था। इंदिरा ने 1970 दिसंबर में ब्राडकॉस्ट माध्यम से लोकसभा को भंग करने की घोषणा करते हुए कहा कि भारत की लाखों की आबादी रोटी-मकान व रोजगार की मांग कर रही है। और कार्यवाही करने के लिए दबाव भी बना रहा है। लोकतंत्र में असली शक्ति जनता में निहीत है। इसलिए हमने जनता के बीच नये प्रकार के जनादेश के लिए जाने का निश्चिय किया है। मोदी भी जनता से जुड़ने के लिए रेडियो माध्यम से मासिक कार्यक्रम मन की बात करते नज़र आते हैं। निश्चित तौर पर समकालीन राजनीति में जनसंचार, सोशल मीडिया के इस प्रयोग ने राजनीतिक कलेवर बदला है।

 

  दोनों नेताओं ने लोगों को उच्च आदर्शों से जोड़ा।

  इंदिरा गाँधी ने बैंकों के राष्ट्रीयकरणगरीबी हटाओं के नाम पर जहाँ लोगों की नब्ज़ टटोलने का काम किया, वहीं नरेन्द्र मोदी ने भी भ्रष्टाचार पर नकेल कंसने के लिए नोटबंदी का प्रयोग किया। लोगों ने भ्रष्टाचार के खात्मे में प्रधानमंत्री के निर्णय का स्वागत किया। लोकतांत्रिक राजनीति व चुनावी अध्ययन को एक नये तरह से देखने के लिए युवा शोधार्थियों-पत्रकारों व शिक्षकों द्वारा स्थापित  संस्था IESAI (International Election Studies Association of India) ने उत्तर प्रदेश में चुनाव के दौरान किये अपने अध्ययन के आधार पर दिखाया कि करीब 54 फीसदी लोगों ने नोटबंदी के संबंध में प्रधानमंत्री के प्रयास का समर्थन किया।

 

  राष्ट्रवाद के विषय पर भी मोदी व इंदिरा गाँधी के बीच समानता देखी जा सकती है।

इंदिरा गाँधी द्वारा 1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के समय जहाँ राष्ट्रवाद को एक केन्द्रीय विचारधारा के रुप में प्रस्तुत किया वहीं वर्तमान समय में प्रधानमंत्री द्वारा स्वयं को राष्ट्रवाद का पुरोधा के रुप में प्रस्तुत किया जा रहा है। गौरतलब है कि इन दोनों ही नेताओं द्वारा उनके विरोधी स्वर को राष्ट्र-विरोधी भी करार दिया गया है। उदाहरणस्वरुप,1973 में बिहार व गुजरात में विद्यार्थियों, अकादमिकों व गैर-सरकारी संगठनों के द्वारा सरकार के खिलाफ प्रदर्शन अथवा वर्तमान में विद्यार्थियों के एक वर्ग द्वारा जेएनयू व डीयू में जब विरोध प्रदर्शन किया जाता है तो उन्हें राष्ट्र-विरोधी कहा गया है।  आक्रमक शैली इन दोनों ही नेताओं की सबसे बड़ी समानता रही है। इंदिरा ने 1971 की प्रतिक्रियावादी वृहत गठबंधन को जहाँ गैर-वैधानीकृत किया वहीं, मोदी ने भी अपनी जबदरदस्त जीत के साथ कांग्रेस मुक्त भारत का विकल्प प्रस्तुत किया।

 

भ्रष्टाचार विरोधी भाषण के बावजूद मोदी भाजपा को उससे मुक्त करने में अब तक बहुत सफल नहीं रहे हैं। असोसीएशन  ऑफ डेमोक्रेटिक रिफार्म (एडीआर)  के आँकड़े के अनुसार, उत्तर प्रदेश में भाजपा के निर्वाचित 312 विधायकों में से करीब 83 के अधिक आपराधिक मामले हैं। मिलन वैष्णव की हाल में प्रकाशित लेख When Crime Pays : Money and Muscle in Indian Politics के हवाले से बताया है कि 2004 से 2014 तक भाजपा के करीब 24 फीसदी उम्मीदवारों पर आपराधिक मामले लंबित हैं, यह किसी अन्य दल के आँकड़े से अधिक है।

 

अपने दल में दोनों ही नेताओं का वर्चस्व

1970 की शुरुआत में इंदिरा गाँधी की ही तरह नरेन्द्र मोदी 2014 से अपने दल के अध्यक्ष व राज्य के मुख्यमंत्रियों के चयन पर अंतिम सहमति देते रहे हैं। इसी श्रेणी में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को लिया जा सकता है, जो भारतीय इतिहास में पहले ऐसे मुख्यमंत्री हैं जो पूर्व में किसी धार्मिक पद पर आसीन थे। नये भाजपा शासित राज्यों को देखें तो पार्टी ने बिना किसी मुख्यमंत्री के उम्मीदवार को आगे बढ़ाये  चुनाव लड़ा है। ऐसे में चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री ही मुख्य कैंपेनर की भूमिका में होते हैं।

 

दोनों नेताओं की कार्यशैली में अंतर भी है

इंदिरा व मोदी में समानता के बावजूद दोनों ही नेताओं में कई मूल अंतर है जिसे देखा जाना चाहिए।

पहला, सत्तर के दशक में इंदिरा की कांग्रेस(आर) सभी धार्मिक समुदायों का प्रतिनिधित्व करती थी। परंतु इसके ठीक विपरित भाजपा ने उत्तर प्रदेश चुनाव में किसी भी मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट नहीं दिया, वहीं बिल्कुल आगे बढ़कर मुखर हिन्दुत्व नेता (जिनके पूर्व में दिये बयानों से अल्पसंख्यक समाज घोर प्रतिक्रिया करता रहा है) को शासन की कमान सौंप दिया।

दूसरा, इंदिरा गाँधी के नेतृत्व काल में उच्च जाति से आने वाले सांसदों व विधायकों की संख्या में लगातार कमी होती गई। जबकि इसके ठीक विपरित 2014 में भाजपा के सत्ता में आने बाद इसके उच्च जाति से आने वाले प्रतिनिधियों की संख्या में लगातार वृद्धि हुई है। उत्तर प्रदेश के संदर्भ में देखें तो त्रिवेणी सेंटर फॉर पॉलिटिकल डाटा ने अपने रिपोर्ट में दिखाया है कि  इस बार के यूपी चुनाव में करीब 44 प्रतिशत उच्च जाति के विधायकों की संख्या है, जोकि 2012 की तुलना में 12 फीसदी अधिक है।

उपरोक्त डाटा यह साफ संकेत देता है कि भारतीय चुनाव के माध्यम से जो नई पापुलिज्म दिखाई पड़ रही है वह अभिजात्यवादी प्रतिशोध (elite revenge) रुपी वाहन पर सवार होकर आई है। भाजपा इस देश में एथनिक डेमोक्रेसी के मॉडल पर लेकर चल रही है। इस मॉडल को इजरायली समाजवैज्ञानिक सैमी समुहा ने अपने देश के अनुभव के आधार पर लिखा था- शासन प्रणाली अभी भी लोकतांत्रिक संविधान (इसमें चुनाव निष्पक्ष होता हो, न्यायपालिका की भी स्वतंत्रता हो इत्यादि) पर आधारित होता है, परंतु व्यवहार में अल्पसंख्यक तबका हाशिये पर चला जाता है।

दोनों नेताओं की तुलना के उपरांत यह कहा जा सकता है कि जो पॉपुलिज्म दिखाई पड़ता है वह एक राजनीतिक शैली का अधिक है ना कि लेफ्ट व राईट के वैचारिक बहस का।

अब तक हुए विमर्श में दो प्रमुख चीज़े ऐसी भी थी जिसकी तुलना अभी तक हमने नहीं किया हैं। पहला, लोक नीति यानि पब्लिक पॉलिसी के निष्पादन के नज़रिये से इन दोनों ही नेताओं की तुलना। अमूमन यही होता है कि जो पॉपुलिस्ट नेता होते हैं वह बोलते अधिक हैं, काम कम करते हैं। सत्तर के दशक में इंदिरा भी प्रिवी पर्स के उन्मूलन व बैंकों के राष्ट्रीकरण के अलावा उन संस्थाओं का निर्माण नहीं कर पाई जिसे नेहरु ने किया था। मोदी भी अभी तक कोई बड़ी सुधार नहीं कर पाये हैं, हालांकि उनके पास समय व बहुमत है, वे इस ओर बढ़ सकते हैं।

दूसरा, कांग्रेस (आर) से कांग्रेस(आई) में जब रुपांतरण हुआ, उसके बाद निर्णय लेने की पूरी प्रक्रिया केन्द्रीकृत हो गई है, वहीं आंतरिक लोकतंत्र भी बुरी तरह से प्रभावित रहा। इंदिरा के शासनकाल में कांग्रेस पार्टी के भीतर यस मैन वाली स्थिति बहाल हो गई, कांग्रेस में इंदिरा के काल की हैजोमोनिक स्थिति ने हालांकि पार्टी को बाद के काल में और बद्दतर बनाया। भाजपा जैसे कैडर आधारित दल के बारे में इस संदर्भ में कोई टिका-टिप्पणी अभी जल्दबाजी होगी।

 

 

 क्रिस्टोफ़ जेफरलो, पेरिस स्थित शोध संस्थान CERI- Science PO,CNRS में सीनियर           रिसर्च फैलो हैं, वहीं किंग्स कॉलेज, लंदन में भारतीय राजनीति व समाजशास्त्र के             प्रोफेसर हैं।

  पंकज कुमार झा, राजनीति विज्ञान विभाग, डीयू से पीएचडी हैं। आप लंदन स्कूल ऑफ         इकोनॉमिक्स से जुड़े प्रोजेक्ट EECURI नेटवर्क से जुड़े रहे हैं।

 

 

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